आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला: पिता की सहमति के बिना सिंगल मदर भी कर सकती है बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन, बशर्ते...

Shahadat

3 Jun 2026 9:04 PM IST

  • आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला: पिता की सहमति के बिना सिंगल मदर भी कर सकती है बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन, बशर्ते...

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक सिंगल मदर अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए पिता की सहमति या हस्ताक्षर के बिना भी आवेदन करने की हकदार है, बशर्ते पासपोर्ट नियमों के तहत निर्धारित घोषणाएँ जमा की गई हों।

    पासपोर्ट नियम, 1980 के तहत—विशेष रूप से पासपोर्ट आवेदन पत्र भरने के लिए दिशानिर्देशों के कॉलम 16 और पासपोर्ट मैनुअल/दिशानिर्देशों के क्लॉज़ 4.8 के तहत—एक सिंगल पेरेंट (एकल अभिभावक) निर्धारित हलफनामा/घोषणाएं जमा करके दूसरे अभिभावक की सहमति के बिना भी अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकता है।

    जस्टिस बट्टू देवानंद ने सिंगल मदर द्वारा अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए दायर आवेदन को प्रोसेस करने का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की:

    “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि इस रिट याचिका में शामिल मुद्दा अब कोई नया या अनसुलझा मुद्दा नहीं रह गया है। विभिन्न हाईकोर्ट्स ने इस मुद्दे पर विचार किया है और तर्कसंगत फैसले दिए हैं, जिनमें यह माना गया कि सिंगल पेरेंट अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए दूसरे अभिभावक की सहमति या हस्ताक्षर के बिना भी आवेदन करने का हकदार है, बशर्ते वह निर्धारित अनुलग्नक (Annexures) जमा करे।

    मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए, और ऊपर बताए गए विभिन्न हाई कोर्ट्स के फैसलों के आलोक में, तथा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता ने आवेदन के साथ अनुलग्नक-C और D में घोषणाएँ पहले ही जमा कर दी हैं—इस कोर्ट की सुविचारित राय में—चूंकि याचिकाकर्ता एक सिंगल पेरेंट है, इसलिए वह अपने पति की सहमति या हस्ताक्षर के बिना भी अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन करने की हकदार है।

    तदनुसार, इस रिट याचिका स्वीकार की जाती है और प्रतिवादी नंबर 2 को यह निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता द्वारा अपने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट जारी करवाने के लिए जमा किए गए आवेदन पर इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 02 (दो) सप्ताह की अवधि के भीतर विचार करे।”

    Case Title: Shaik Shabana v. Union of India & Anr.

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