पत्नी द्वारा 'छोड़ देने' के आधार पर तलाक़ मिलने से पति CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता: उड़ीसा हाईकोर्ट
उड़ीसा हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि सिर्फ़ इसलिए कि पति के पक्ष में तलाक़ का फ़ैसला इस आधार पर दिया गया कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया था, यह अपने आप में तलाक़ के बाद पत्नी को भरण-पोषण देने में कोई रुकावट नहीं डालता।
कानून की स्थिति को स्पष्ट करते हुए जस्टिस डॉ. संजीव कुमार पाणिग्राही की पीठ ने यह राय व्यक्त की–
“BNSS के तहत भरण-पोषण का प्रावधान अब धारा 144 के रूप में पुन: क्रमांकित किया गया। इसकी व्याख्या में 'पत्नी' शब्द के अंतर्गत एक ऐसी तलाक़शुदा महिला को भी शामिल किया गया, जिसने अभी तक पुनर्विवाह नहीं किया... उपरोक्त कानूनी संदर्भों को देखते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट है कि पत्नी द्वारा छोड़ देने के आधार पर दिया गया तलाक़ का फ़ैसला, अपने आप में तलाक़ के बाद भरण-पोषण पाने में कोई कानूनी बाधा उत्पन्न नहीं करता है। इसलिए याचिकाकर्ता इस व्यापक तर्क के आधार पर सफल नहीं हो सकता कि यह वर्तमान कार्यवाही मूल रूप से सुनवाई योग्य नहीं है, सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी द्वारा छोड़ देने का फ़ैसला अब अंतिम रूप ले चुका है।”
याचिकाकर्ता-पति और विपक्षी-पत्नी का विवाह 05.12.2003 को हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार हुआ था। आरोप है कि पत्नी ने 15.01.2004 को अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया और वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू करने के प्रयासों के बावजूद वह उसके बाद कभी वापस नहीं लौटी। अंततः, याचिकाकर्ता ने तलाक़ की अर्ज़ी दायर की, जिसकी सुनवाई के दौरान पत्नी को 'पेंडेंटे लाइट' (मुकदमे के दौरान) भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा भरण-पोषण के आदेश का पालन न करने के कारण तलाक़ की कार्यवाही में उसकी दलीलों को रद्द कर दिया गया और उसकी अर्ज़ी ख़ारिज की।
प्रतिवादी-पत्नी ने CrPC की धारा 125 के तहत अलग कार्यवाही शुरू की, जिसमें उसे ₹20,000/- प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
भरण-पोषण की बकाया राशि का भुगतान करने के बाद तलाक़ की वह कार्यवाही जिसे पहले ख़ारिज किया गया था, उसे फिर से बहाल कर दिया गया। इसके बाद पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत एक अर्ज़ी दायर की, जिसमें उसने 'वैवाहिक अधिकारों की बहाली' (Restitution of Conjugal Rights) की मांग की। फ़ैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता की तलाक़ की मांग ख़ारिज की और पत्नी की 'वैवाहिक अधिकारों की बहाली' की प्रति-मांग (Counter-Claim) को स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने 14.07.2022 के एक आदेश से भरण-पोषण (Maintenance) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता की अपील खारिज की और CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण दिए जाने के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद, तलाक की याचिका खारिज होने के खिलाफ पति की वैवाहिक अपील पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने 21.11.2023 को फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया; कोर्ट ने 'त्याग' (Desertion) के आधार पर तलाक मंजूर कर लिया और यह टिप्पणी की कि पति द्वारा पहले से भुगतान की गई राशि को ही 'स्थायी गुजारा भत्ता' (Permanent Alimony) माना जाएगा।
उपर्युक्त आदेश के अनुपालन में याचिकाकर्ता ने नवंबर 2023 से पत्नी को भरण-पोषण देना बंद किया। इस आदेश के खिलाफ पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में एक 'विशेष अनुमति याचिका' (Special Leave Petition) दायर की। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को पलटा तो नहीं, लेकिन दोनों पक्षों को यह स्वतंत्रता दी कि वे किसी सक्षम मंच के समक्ष उचित कानूनी उपाय अपना सकते हैं।
अतः, पत्नी ने CrPC की धारा 125 (या BNSS की धारा 144) के तहत एक और आवेदन दायर किया, जिसमें उसने तलाक के बाद भरण-पोषण की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने, BNSS की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट में दायर इस वर्तमान आवेदन के माध्यम से, पत्नी के इस नए आवेदन को चुनौती दी।
Case Title: Dr. Deepak Padhi v. Gayatri Panda