जीवनसाथी की बातचीत बिना अनुमति रिकॉर्ड करना निजता के अधिकार का उल्लंघन, तलाक के मुकदमे में सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं: तेलंगाना हाईकोर्ट

Update: 2026-07-11 10:58 GMT

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी की टेलीफोन पर हुई बातचीत को उनकी अनुमति के बिना गुप्त रूप से रिकॉर्ड करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। ऐसे कॉल रिकॉर्डिंग को वैवाहिक विवाद या तलाक के मुकदमे में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस नामावरापु राजेश्वर राव ने दो दीवानी पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा,

"पक्षकारों के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग के संबंध में निचली अदालत का यह निष्कर्ष सही है कि दूसरे पक्ष की सहमति के बिना कॉल रिकॉर्ड करना निजता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए बिना सहमति की गई ऐसी रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामला पति द्वारा क्रूरता के आधार पर दायर तलाक की याचिका से जुड़ा था। पति ने निचली अदालत में कुछ इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, जिनमें कथित कॉल रिकॉर्डिंग भी शामिल थी, रिकॉर्ड पर लेने का अनुरोध किया था। निचली अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज किया कि रिकॉर्डिंग के साथ कानून के अनुसार आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया और यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि मूल मोबाइल फोन उपलब्ध है या नहीं।

हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि इन दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर ले लिया जाना चाहिए और उनकी स्वीकार्यता व साक्ष्य मूल्य पर अंतिम सुनवाई के समय फैसला किया जा सकता था। यह भी कहा गया कि कॉल और आवाज़ की रिकॉर्डिंग की सत्यता की जांच एक निजी प्रयोगशाला से कराई गई थी तथा रिकॉर्डिंग सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई।

पति ने मेडिकल दस्तावेज़, बैंक भुगतान का विवरण, हवाई टिकट, तस्वीरें और धन हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेज भी रिकॉर्ड पर लेने की मांग की।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि गुप्त रूप से की गई कॉल रिकॉर्डिंग स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने शेष दस्तावेजों की भी समीक्षा की और पाया कि वे मेडिकल रिकॉर्ड, यात्रा संबंधी दस्तावेज, भुगतान रसीदें, तस्वीरें और धन हस्तांतरण से जुड़े रिकॉर्ड हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह समझ से परे है कि ये दस्तावेज पति के क्रूरता के आरोप को कैसे साबित करते हैं। इसके विपरीत, ये दस्तावेज दोनों के बीच सौहार्दपूर्ण और सामान्य वैवाहिक जीवन का संकेत देते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि सामान्य वैवाहिक जीवन के दौरान पत्नी के खर्च का वहन करना पति की जिम्मेदारी होती है और ऐसे खर्चों के दस्तावेज अपने-आप में क्रूरता का प्रमाण नहीं बन सकते।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दोनों पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कीं।

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