उमीद पोर्टल को लेकर वक्फ मुतवल्ली की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार, प्राधिकरण के समक्ष शिकायत रखने की छूट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उमीद पोर्टल में कथित तकनीकी खामियों को लेकर वक्फ मुतवल्ली द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी शिकायतें रखने की स्वतंत्रता दी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले में सीधे तौर पर रिट याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अपनी समस्याओं के समाधान या स्पष्टीकरण के लिए निर्धारित प्राधिकरण से संपर्क कर सकता है।
सुनवाई की शुरुआत में चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डॉ. मेनका गुरुस्वामी से सवाल किया कि वह सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों आई हैं और हाइकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया गया।
इस पर गुरुस्वामी ने दलील दी कि वर्ष 2025 के संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, इसलिए हाइकोर्ट इस मामले को नहीं सुनेंगे।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की शिकायतें मुख्य रूप से प्रशासनिक और तकनीकी कठिनाइयों से जुड़ी हैं, न कि कानून की वैधता को चुनौती देने से, जिन्हें हाइकोर्ट के समक्ष भी उठाया जा सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि वक्फ नियमों में किए गए वर्गीकरण के कारण समस्या उत्पन्न हो रही है, क्योंकि 'वक्फ बाय सर्वे' को 'वक्फ बाय यूजर' की श्रेणी में शामिल कर दिया गया और उमीद पोर्टल के ड्रॉप-डाउन मेन्यू में 'वक्फ बाय सर्वे' का कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि मंत्रालय की ओर से यह स्पष्ट किया जा चुका है कि 'वक्फ बाय सर्वे' को 'वक्फ बाय यूजर' के अंतर्गत समाहित किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता को इस वर्गीकरण से आपत्ति है तो वह इसे अन्य लंबित याचिकाओं में उठाया जा सकता है, लेकिन इसे केवल तकनीकी खामी का मामला नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में संबंधित वक्फ पहले से पंजीकृत है, इसलिए विवरण अपलोड करने में किसी प्रकार की अधिकारों की हानि नहीं होती।
जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि पंजीकरण और पोर्टल पर जानकारी अपलोड करना दो अलग-अलग बातें हैं और अपलोडिंग केवल डेटा एंट्री की प्रक्रिया है।
याचिका मध्य प्रदेश के एक मुतवल्ली द्वारा दायर की गई, जिसमें दावा किया गया कि उमीद पोर्टल संरचनात्मक रूप से दोषपूर्ण है और सर्वे व गजट में अधिसूचित वक्फ संपत्तियों का सही तरीके से पंजीकरण करने में सक्षम नहीं है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि मध्य प्रदेश में अधिकांश वक्फ सर्वे और गजट अधिसूचित हैं, जबकि 'वक्फ बाय यूजर' की श्रेणी वहां लगभग मौजूद ही नहीं है।
इसके बावजूद पोर्टल उपयोगकर्ता को ऐसे विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है, जो कानूनन लागू नहीं होते।
याचिका में यह भी मांग की गई कि पोर्टल को वर्तमान स्वरूप में लागू न किया जाए, जब तक कि उसकी तकनीकी और संरचनात्मक खामियों को दूर न कर दिया जाए, और तब तक किसी भी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई से वक्फ मुतवल्लियों को संरक्षण दिया जाए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता को उचित प्राधिकरण के समक्ष अपनी शिकायतें उठाने की छूट प्रदान की।