UGC नियमों में जाति भेदभाव की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, जाति-निरपेक्ष व्यवस्था की मांग

Update: 2026-01-27 07:05 GMT

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि UGC द्वारा अधिसूचित उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम 2026 का एक प्रावधान भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है, क्योंकि यह सभी वर्गों को समान संरक्षण नहीं देता।

याचिका विशेष रूप से नियम 3(सी) को चुनौती देती है, जिसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों तक सीमित कर दी गई। याचिकाकर्ता वकील विनीत जिंदल ने कहा कि इस प्रावधान के मौजूदा स्वरूप के कारण उन व्यक्तियों को किसी भी प्रकार की शिकायत निवारण व्यवस्था या संस्थागत संरक्षण नहीं मिल पाता जो इन श्रेणियों से बाहर होते हुए भी जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करते हैं।

याचिका में दलील दी गई कि इस तरह की सीमित परिभाषा समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे गैर-समावेशी बताया गया। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि संबंधित प्राधिकरणों को इस प्रावधान को लागू करने या इसके आधार पर कोई कार्रवाई करने से रोका जाए। साथ ही यह भी मांग की गई कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को जाति-निरपेक्ष और संविधान के अनुरूप बनाया जाए ताकि जाति की पहचान की परवाह किए बिना भेदभाव का शिकार होने वाले सभी व्यक्तियों को संरक्षण मिल सके।

याचिका में यह भी कहा गया कि UGC नियमों के तहत बनाए गए समान अवसर केंद्र, इक्विटी हेल्पलाइन, जांच तंत्र और ओम्बड्सपर्सन की प्रक्रिया सभी के लिए समान और भेदभावरहित होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने आग्रह किया कि जब तक नियम 3(सी) पर पुनर्विचार नहीं हो जाता, तब तक इन व्यवस्थाओं को जाति-निरपेक्ष रूप से लागू करने के निर्देश दिए जाएं।

इसके अलावा याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई कि जाति की पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को शिकायत निवारण तंत्र से वंचित करना राज्य द्वारा किया गया अस्वीकार्य भेदभाव है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

उल्लेखनीय है कि UGC ने ये नियम वर्ष 2019 में दायर जनहित याचिका के बाद तैयार किए। यह याचिका राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तडवी द्वारा दायर की गई, जो क्रमशः रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताएं हैं। रोहित वेमुला और पायल तडवी की कथित तौर पर अपने-अपने विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव के कारण आत्महत्या हो गई।

मार्च, 2025 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि UGC इन मुद्दों से निपटने के लिए नियमों का मसौदा तैयार कर चुका है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से निपटने के लिए एक मजबूत और प्रभावी व्यवस्था चाहता है। अप्रैल में कोर्ट ने यूजीसी को मसौदा नियमों को अंतिम रूप देने और अधिसूचित करने की अनुमति दी थी। साथ ही याचिकाकर्ताओं और अन्य पक्षों को सुझाव देने की छूट भी दी गई।

इसके बाद सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को विभिन्न हितधारकों से प्राप्त सुझावों पर विचार करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया। अंततः जनवरी, 2026 में इन नियमों को अधिसूचित किया गया, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

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