छात्र प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण, कहा- राज्य कानून के अनुसार FIR बंद/वापस लेने के लिए स्वतंत्र
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि 20 जुलाई के 'चलो संसद' छात्र प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को राज्य सरकारें कानून के अनुसार बंद (Closure Report) करने या आगे की कार्रवाई वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने कहा कि उसके 28 जुलाई के आदेश का उद्देश्य राज्यों को ऐसा करने से रोकना नहीं था।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 28 जुलाई के आदेश में प्रयुक्त "आपराधिक पृष्ठभूमि (Criminal Antecedents)" से आशय केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है।
कोर्ट ने कहा कि छोटे-मोटे मामलों या सामान्य अपराधों में फंसे छात्रों को इस आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्र सरकार छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है, लेकिन एफआईआर सीधे वापस लेने का प्रावधान नहीं होने के कारण कानूनी प्रक्रिया को लेकर कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं। उन्होंने कहा कि इस संबंध में विभिन्न कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत एफआईआर समाप्त करने की एक उपयुक्त प्रक्रिया तय कर सकती है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कहा कि हजारों अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज व्यापक एफआईआर का दुरुपयोग हो सकता है।
वहीं, सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" शब्द को स्पष्ट करने की मांग की, ताकि मामूली मामलों में फंसे छात्रों को परेशान न किया जाए।
सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग, पेलेट गन के इस्तेमाल, फेशियल रिकग्निशन तकनीक, बायोमेट्रिक निगरानी और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज जैसे मुद्दे भी उठाए गए।
इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए, लेकिन छात्र प्रदर्शन की आड़ में गंभीर अपराध करने वालों को भी कानून का लाभ नहीं मिल सकता।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह नागरिक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर एक प्रोटोकॉल तय करेगा। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।