सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल के शिक्षक वैधानिक वेतनमान लागू कराने के लिए उसके खिलाफ रिट याचिका दायर कर सकते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी कानून के तहत शिक्षकों के वेतन और सेवा शर्तों को लेकर स्कूल पर वैधानिक दायित्व तय किया गया हो तो उस दायित्व के पालन के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्य होगी।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने कहा कि कानून के तहत मान्यता प्राप्त संस्थान द्वारा शिक्षा प्रदान करना सार्वजनिक कर्तव्य निभाने के समान है। इसलिए शिक्षकों की सेवा से जुड़े अधिकार यदि किसी कानून से उत्पन्न होते हैं, तो उन अधिकारों को लागू कराने के लिए रिट याचिका दायर की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ का फैसला बरकरार रखा, जिसमें निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों की ओर से दाखिल रिट याचिकाओं को स्वीकार किया गया था। शिक्षकों ने वैधानिक वेतनमान लागू करने की मांग की थी।

मामला निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के वेतन से जुड़ा था। शिक्षकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करते हुए महाराष्ट्र कर्मचारी निजी स्कूल सेवा शर्त विनियमन नियम, 1981 की अनुसूची 'C' के अनुसार वेतनमान लागू करने की मांग की।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्कूलों को शिक्षकों का वेतन अनुसूची 'C' के अनुसार निर्धारित करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने अप्रैल 2017 से नियमित वेतन का भुगतान करने और छह महीने के भीतर बकाया राशि चुकाने का भी आदेश दिया। साथ ही स्कूलों को पहले से अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली करने से रोक दिया।

निजी स्कूलों ने सुप्रीम कोर्ट में इन रिट याचिकाओं की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थानों के खिलाफ ऐसी रिट याचिका नहीं लाई जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए निजी संस्थानों की अपील भी खारिज की। कोर्ट ने कहा कि यदि शिक्षक किसी निजी स्कूल के साथ अपने निजी अनुबंध से जुड़े विवाद का निपटारा कराने के लिए रिट याचिका दायर करते, तो ऐसी याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती। लेकिन इस मामले में शिक्षकों का नियमित वेतन पाने का अधिकार वैधानिक नियमों से उत्पन्न होता है।

खंडपीठ ने कहा कि जब किसी कानून से अधिकार पैदा होते हैं और उसी कानून के तहत किसी शिक्षण संस्थान पर उस अधिकार को लागू करने का दायित्व डाला गया तो उस दायित्व के पालन के लिए निजी गैर-सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान के खिलाफ भी रिट याचिका दायर की जा सकती है, बशर्ते उस दायित्व में सार्वजनिक तत्व मौजूद हो।

कोर्ट ने कहा,

“शिक्षा प्रदान करना सार्वजनिक कर्तव्य निभाने के समान है। इसलिए शिक्षण कार्य का उस सार्वजनिक कर्तव्य से सीधा संबंध है और यदि शिक्षकों के अधिकार किसी कानून से उत्पन्न होते हैं तो उन अधिकारों को लागू कराने के लिए रिट याचिका दायर की जा सकती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिट याचिका की सुनवाई योग्यता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि संबंधित संस्था सरकारी है या निजी। महत्वपूर्ण यह है कि संस्था पर किस प्रकार का दायित्व लगाया गया।

खंडपीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण के खिलाफ रिट जारी करने की शक्ति देता है। यह शक्ति केवल राज्य, उसके अधिकारियों या अनुच्छेद 12 के तहत आने वाले प्राधिकरणों तक सीमित नहीं है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जिस दायित्व को लागू कराने की मांग की जा रही है, वह पूरी तरह निजी कानून के क्षेत्र में आता है तो केवल उस आधार पर रिट याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। रिट अधिकारिता का मूल उद्देश्य सार्वजनिक दायित्व का पालन सुनिश्चित करना है।

इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निजी स्कूलों की अपील खारिज की और शिक्षकों की वैधानिक वेतनमान लागू कराने संबंधी रिट याचिकाओं की सुनवाई को सही ठहराया।

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