RWA को IBC कार्यवाही में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं, जब तक वह स्वयं वित्तीय लेनदेन की पक्षकार न हो: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-01-16 10:20 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 जनवरी) को यह स्पष्ट किया कि रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) या होमबायर्स की कोई संस्था कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक कि वह स्वयं धनराशि का भुगतान करने वाली इकाई (financial creditor) न हो या सीधे वित्तीय लेनदेन की पक्षकार न हो।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा:

“कोई सोसायटी या रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, जो अपने अधिकार में स्वयं लेनदार नहीं है और जिसे IBC के तहत अलॉटीज़ का अधिकृत प्रतिनिधि भी मान्यता प्राप्त नहीं है, उसे धारा 7 की याचिका से उत्पन्न कार्यवाही में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।”

खंडपीठ ने एक होमबायर्स एसोसिएशन द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एलेग्ना को-ऑपरेटिव हाउसिंग एंड कमर्शियल सोसायटी लिमिटेड से जुड़ा है, जो अहमदाबाद स्थित “तक्षशिला एलेग्ना” परियोजना के एक पूर्ण टावर के 189 यूनिट धारकों का प्रतिनिधित्व करती थी।

जब एडलवाइस ARC ने तक्षशिला हाइट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ IBC की धारा 7 के तहत कार्यवाही शुरू की, तो उक्त सोसायटी ने अपने सदस्य होमबायर्स के हितों की रक्षा के नाम पर उसमें हस्तक्षेप की अनुमति मांगी।

हालांकि, NCLAT ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि सोसायटी के पास लोकस स्टैंडी (हस्तक्षेप का अधिकार) नहीं है। इसी आदेश को चुनौती देते हुए सोसायटी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए निर्णय में कोर्ट ने NCLAT के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि:

IBC की धारा 7 के तहत प्रवेश (admission) के चरण पर कार्यवाही सख्ती से द्विपक्षीय होती है—केवल वित्तीय लेनदार और कॉरपोरेट देनदार के बीच।

इस चरण पर न्यायाधिकरण का दायरा केवल यह देखने तक सीमित है कि क्या कोई वित्तीय ऋण मौजूद है और क्या चूक (default) हुई है।

इस स्तर पर तीसरे पक्ष, जिनमें अन्य लेनदार या प्रतिनिधि संस्थाएं भी शामिल हैं, को हस्तक्षेप का स्वतंत्र अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

“RWA केवल होमबायर्स के हितों का प्रतिनिधित्व करने के आधार पर स्वयं को वित्तीय लेनदार नहीं बता सकती। जब तक यह सिद्ध न हो कि RWA स्वयं लेनदार है, उसे हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।”

अपीलकर्ता सोसायटी पर विशेष टिप्पणियां

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अपीलकर्ता सोसायटी:

न तो वित्तीय लेनदार है और न ही ऑपरेशनल लेनदार

यह एक मेंटेनेंस सोसायटी है, जिसे दिवाला प्रतिनिधित्व के लिए गठित नहीं किया गया

सोसायटी के पास पंजीकरण, सामूहिक प्राधिकरण या जनरल बॉडी के प्रस्ताव का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है

इसकी सदस्यता अनिवार्य है, जिससे सहमति आधारित प्रतिनिधित्व का दावा टिकता नहीं

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हस्तक्षेप का आवेदन पहली बार अपीलीय स्तर पर दायर किया गया था, न कि NCLT के समक्ष।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

“जब NCLT या NCLAT की कार्यवाही में भाग लेने का कोई आधारभूत वैधानिक अधिकार ही नहीं है, तो अपीलीय स्तर पर सुनवाई का दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा अधिकार केवल क़ानून से उत्पन्न होता है, यह स्वाभाविक अधिकार नहीं है।”

इसी आधार पर, अदालत ने RWA की अपील खारिज कर दी।

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