वेटिंग लिस्ट अवधि समाप्त होने के बाद वेट-लिस्टेड उम्मीदवार को नियुक्ति का कोई निहित अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार से जुड़े मामलों में स्पष्ट किया है कि प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में शामिल उम्मीदवारों को नियुक्ति का कोई निहित (वेस्टेड) या स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं होता, विशेषकर तब, जब प्रतीक्षा सूची की वैधानिक अवधि समाप्त हो चुकी हो।
न्यायालय ने कहा कि जब चयन/मेरिट सूची में शामिल उम्मीदवार को भी नियुक्ति का कोई अपराजेय (इंडिफीज़िबल) अधिकार नहीं होता, तो यह मानना और भी अनुचित होगा कि प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवार को उससे अधिक अधिकार प्राप्त है। इस संदर्भ में कोर्ट ने संविधान पीठ के फैसले Shankarsan Dash बनाम Union of India (1991) 3 SCC 47 का हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे, ने Rajasthan Public Service Commission (RPSC) की अपील स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होने के बाद भी वेट-लिस्टेड उम्मीदवारों की नियुक्ति का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
पीठ विभिन्न अपीलों की सुनवाई कर रही थी, जो RPSC द्वारा संचालित अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ी थीं। प्रत्येक मामले में मुख्य चयन सूची राज्य सरकार को भेजी गई थी और राजस्थान सेवा नियमों के अनुसार एक आरक्षित/प्रतीक्षा सूची भी तैयार की गई थी, जिसकी वैधता मुख्य सूची के अग्रेषण की तिथि से छह माह निर्धारित थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवारों की याचिकाएं स्वीकार करते हुए नियुक्ति का निर्देश दिया था, जिसे RPSC ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
मुख्य प्रश्न
क्या प्रतीक्षा सूची की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद, चयनित उम्मीदवारों के जॉइन न करने से उत्पन्न रिक्तियों पर वेट-लिस्टेड उम्मीदवार नियुक्ति का दावा कर सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट का उत्तर
न्यायालय ने इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हुए कहा कि प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होने के बाद उम्मीदवार नियुक्ति का अधिकार दावा नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति दत्ता द्वारा लिखित निर्णय में प्रतीक्षा सूची से जुड़े अधिकारों के प्रमुख सिद्धांतों को संक्षेप में इस प्रकार स्पष्ट किया गया—
प्रतीक्षा सूची सामान्यतः चयन/मेरिट सूची तैयार होने के बाद बनाई जाती है।
इसमें वे उम्मीदवार होते हैं जिन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण की हो, लेकिन तत्काल नियुक्ति हेतु पर्याप्त मेरिट न हो।
यह सूची एक मेरिट-आधारित कतार की तरह कार्य करती है, ताकि चयन सूची के उम्मीदवारों के नियुक्ति प्रस्ताव स्वीकार न करने पर रिक्तियां भरी जा सकें।
प्रतीक्षा सूची की वैधता सीमित अवधि की होती है।
इसकी वैधता भर्ती नियमों पर निर्भर करती है; अवधि निर्धारित न होने पर, अगली भर्ती विज्ञप्ति तक इसे bona fide रूप से संचालित किया जा सकता है।
प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति का अवसर तभी उत्पन्न होता है, जब चयन सूची की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी रिक्तियां शेष रहें; यह कोई संयोग नहीं बल्कि एक प्रक्रियात्मक परिणाम है।
वेट-लिस्टेड उम्मीदवार की नियुक्ति कब संभव?
कोर्ट ने दो परिस्थितियों को स्पष्ट किया—
स्थिति 1:
यदि चयनित उम्मीदवार निर्धारित समय में नियुक्ति प्रस्ताव स्वीकार नहीं करता और प्रस्ताव रद्द हो जाता है, तथा उस समय प्रतीक्षा सूची वैध हो, तो सूची में शीर्ष पर मौजूद उम्मीदवार को नियुक्ति का प्रस्ताव दिया जाना चाहिए। गैर-नियुक्ति के लिए प्रशासन को उचित और गैर-मनमाना कारण बताना होगा।
स्थिति 2:
यदि चयनित उम्मीदवार प्रस्ताव स्वीकार कर जॉइन करता है लेकिन तुरंत या कुछ समय बाद इस्तीफा दे देता है—
यदि यह इस्तीफा प्रतीक्षा सूची की वैधता अवधि के भीतर होता है, तो अगले उम्मीदवार को नियुक्ति दी जा सकती है।
लेकिन यदि इस्तीफा उस समय होता है जब प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त हो चुकी हो, तो वेट-लिस्टेड उम्मीदवार को नियुक्ति की कोई वैध अपेक्षा नहीं रह जाती।
अंतिम निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवार को नियुक्ति का कोई अधिकार, विशेषकर अपराजेय अधिकार, प्राप्त नहीं होता, सिवाय उन अपवादात्मक परिस्थितियों के, जहां भर्ती नियम स्वयं सीमित अवधि के भीतर नियुक्ति की अनुमति देते हों और प्रशासन बिना उचित कारण के नियुक्ति से इनकार करे।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता भर्ती नियमों में निर्धारित अधिकारों की प्रकृति और सीमा को दी जानी चाहिए, न कि मात्र प्रतीक्षा सूची में स्थान को।