देर से अदालत आने वाले, दूसरों की सफलता देखकर समान राहत का अधिकार नहीं जता सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि समान स्थिति वाले कुछ अन्य कर्मचारियों को राहत मिल गई है, लंबे समय बाद समानता (parity) के आधार पर राहत की मांग नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे विलंबित दावे पहले से निपट चुके मामलों को दोबारा खोलने का प्रयास होते हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा:
“जो लोग लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद, केवल यह देखकर कि अन्य लोग सफल हो गए हैं, समान लाभ की मांग करते हैं, वे स्वाभाविक रूप से ऐसी राहत का दावा नहीं कर सकते।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उन याचिकाकर्ताओं से जुड़ा है जिनकी पुनर्नियुक्ति (reinstatement) के संबंध में अधिकरण द्वारा दिया गया आदेश, बॉम्बे प्राइमरी एजुकेशन एक्ट, 1947 की धारा 24(4) के तहत राज्य सरकार द्वारा समीक्षा शक्ति का प्रयोग करते हुए निरस्त कर दिया गया था।
राज्य सरकार के इस निर्णय को हाईकोर्ट ने सही ठहराया, और यह निर्णय 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी बरकरार रखा गया था। इसके बाद मामला अंतिम रूप से निपट चुका था।
इसके बावजूद, याचिकाकर्ताओं ने एक नई विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के 2021 के आदेश का सहारा लिया, जिसमें सेवा में बने एक शिक्षक के उच्च ग्रेड वेतनमान से संबंधित प्रतिनिधित्व पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता उस 2021 के मामले में पक्षकार नहीं थे, लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि उस निर्णय का लाभ उन्हें भी दिया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं से संबंधित विवाद पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुका है, और इतने लंबे अंतराल के बाद उसे फिर से उठाना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने कहा:
“किसी भी न्यायालय या अधिकरण को 'विचार करने' का निर्देश देने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामला जीवित (live) है। यदि दावा पुराना या समाप्त (stale or dead) हो चुका है, तो न्यायालय को उसे वहीं समाप्त कर देना चाहिए, न कि अनावश्यक और बार-बार होने वाली मुकदमेबाजी को बढ़ावा देना चाहिए।”
अदालत ने State of Uttar Pradesh v. Arvind Kumar Srivastava (2015) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि समानता के आधार पर राहत देने का सिद्धांत विलंब, उदासीनता (laches) और मौन स्वीकृति (acquiescence) जैसे अपवादों के अधीन होता है।
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता 2021 के हाईकोर्ट मामले के पक्षकारों के समान स्थिति में नहीं हैं, इसलिए वे उस आदेश के आधार पर राहत का दावा नहीं कर सकते।
वकीलों को सख्त संदेश
अदालत ने बासी और समाप्त दावों पर आधारित मुकदमेबाजी को हतोत्साहित करने के लिए वकीलों को भी स्पष्ट संदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वकीलों का दायित्व है कि वे:
अदालत के समक्ष पूरे प्रक्रिया इतिहास को स्पष्ट रूप से रखें,
उन आदेशों की ओर ध्यान दिलाएं जो अंतिम रूप से तय हो चुके हैं,
और जहां उपयुक्त हो, मुवक्किलों को ऐसे दोहराव वाले मामलों से दूर रहने की सलाह दें, जो मूल रूप से निपट चुके विवादों को फिर से खोलने का प्रयास हों।
अदालत ने कहा कि यह न्यायिक समय की रक्षा और न्याय प्रणाली में अंतिमता (finality) बनाए रखने के लिए आवश्यक है।