सिर्फ वाहन का घटना से जुड़ा होना मुआवजे के लिए पर्याप्त नहीं, मौत और वाहन के उपयोग के बीच सीधा संबंध होना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ी घटनाओं की श्रृंखला में केवल किसी मोटर वाहन का शामिल होना, मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने कहा कि मुआवजा तभी दिया जा सकता है जब वाहन के उपयोग और मृत्यु के बीच स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष (proximate) संबंध स्थापित हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें वाहन मालिक को मृतक की पत्नी और परिवार को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने यह मान लिया था कि मृतक को चोटें कार के भीतर लगी थीं, जबकि ऐसा निष्कर्ष निकालने का कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था।
मामले के अनुसार, 29 नवंबर 2009 को मृतक अपने परिचित और अपीलकर्ता की कार में बैठकर गया था। तीन दिन बाद, 2 दिसंबर 2009 को उसका शव एक गांव के पास मिला।
मृतक की पत्नी की शिकायत पर अपीलकर्ता और दो अन्य लोगों के खिलाफ अपहरण, हत्या और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था, लेकिन वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 'लास्ट सीन' सिद्धांत साबित न होने के आधार पर अपीलकर्ता को बरी कर दिया।
इस बीच, मृतक की पत्नी और बच्चों ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत दावा याचिका दायर कर कहा कि मृतक की हत्या कार के अंदर हुई थी।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने ₹5.64 लाख से अधिक का मुआवजा दिया, जिसे हाईकोर्ट ने बढ़ाकर ₹8.60 लाख कर दिया। इसके खिलाफ वाहन मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या मृतक की मृत्यु को मोटर वाहन के "उपयोग से उत्पन्न" (arising out of the use of a motor vehicle) माना जा सकता है, जिससे वाहन मालिक या बीमा कंपनी पर मुआवजे की जिम्मेदारी डाली जा सके।
पीठ ने कहा कि दावेदारों के लिए यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि चोटें किस प्रकार लगीं, लेकिन केवल इस आधार पर कि घटनाक्रम में कहीं न कहीं एक कार शामिल थी, मोटर वाहन अधिनियम स्वतः लागू नहीं हो जाएगा।
अदालत ने कहा कि वाहन और मृत्यु के बीच किसी न किसी प्रकार का स्पष्ट संबंध स्थापित होना आवश्यक है।
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने Rita Devi v. New India Assurance Co. Ltd. (2000) के फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि उस मामले में वाहन की चोरी ही मुख्य अपराध था और उसी प्रक्रिया में हुई मृत्यु का सीधा संबंध वाहन से था। लेकिन वर्तमान मामले में हत्या और वाहन के बीच ऐसा प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं किया जा सका।
इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत वाहन मालिक पर मुआवजे की कोई देयता नहीं बनती। अदालत ने हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली।