अपील खारिज होने पर डिक्री के क्रियान्वयन के लिए नई लिमिटेशन अवधि शुरू होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अपील को गैर-हाजिरी (default) के कारण खारिज किया जाता है, तो उससे एक नया लिमिटेशन पीरियड शुरू होता है, और ऐसे में 12 साल के भीतर दायर की गई एग्जीक्यूशन पिटीशन (डिक्री के क्रियान्वयन की अर्जी) मान्य होगी।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि यह तर्क सही नहीं है कि एग्जीक्यूशन पिटीशन की 12 साल की अवधि केवल डिक्री पास होने की तारीख से ही गिनी जाए, खासकर तब जब उस डिक्री के खिलाफ अपील लंबित रही हो।
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एग्जीक्यूशन पिटीशन को लिमिटेशन के आधार पर खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि अपील का डिफॉल्ट में खारिज होना डिक्री होल्डर को नई लिमिटेशन अवधि नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि अपील मूल वाद (सूट) का ही विस्तार होती है, और यदि अपील किसी तकनीकी कारण—जैसे गैर-हाजिरी या देरी—से खारिज होती है, तब भी यह अंतिम निपटारा माना जाएगा और इससे नई लिमिटेशन अवधि शुरू होगी।
पृष्ठभूमि
यह मामला एक डिक्री से जुड़ा है जो 3 दिसंबर 1999 को अपीलकर्ता (डिक्री होल्डर) के पक्ष में पारित हुई थी। इसके खिलाफ प्रतिवादी (जजमेंट डेब्टर) ने अपील दायर की, जिसे 25 नवंबर 2004 को बार-बार अनुपस्थिति के कारण खारिज कर दिया गया।
इसके बाद, डिक्री होल्डर ने 4 दिसंबर 2015 को एग्जीक्यूशन पिटीशन दायर की, जिसे एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने 31 अक्टूबर 2023 को स्वीकार कर लिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि एग्जीक्यूशन पिटीशन लिमिटेशन अवधि (12 साल) से बाहर है, क्योंकि इसे 1999 की डिक्री की तारीख से गिना जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण गलत है। कोर्ट ने माना कि अपील के खारिज होने (25 नवंबर 2004) को ही अंतिम आदेश माना जाएगा, क्योंकि उसी से ट्रायल कोर्ट की डिक्री की पुष्टि होती है।
कोर्ट ने “डॉक्ट्रिन ऑफ मर्जर” का हवाला देते हुए कहा कि अपीलीय अदालत का आदेश ही अंतिम माना जाएगा, भले ही अपील मेरिट पर नहीं बल्कि डिफॉल्ट में खारिज हुई हो।
इसलिए, 12 साल की लिमिटेशन अवधि 25 नवंबर 2004 से शुरू होगी, और 4 दिसंबर 2015 को दायर की गई एग्जीक्यूशन पिटीशन समय सीमा के भीतर मानी जाएगी।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया।