सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि जालसाजी (फर्जीवाड़ा) से जुड़े मामलों में जब हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट लंबित हो तब FIR रद्द करना जल्दबाजी और अनुचित कदम है।
अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें जांच पूरी होने से पहले ही FIR खारिज कर दी गई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने शिकायतकर्ता और राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए FIR बहाल की और जांच एजेंसी को जल्द-से-जल्द जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा,
“जब FIR में जालसाजी के आरोप हों और दस्तावेजों की जांच हस्तलेखन विशेषज्ञ से कराई जा रही हो, तब उसकी रिपोर्ट का इंतजार किए बिना FIR रद्द करना पूरी तरह अनुचित है।”
मामले के अनुसार, आरोप था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के पिता के हस्ताक्षर जाली बनाकर खुद को नामांकित व्यक्ति दिखाया और बैंक खातों से पैसे हड़प लिए। इस संबंध में दस्तावेजों की जांच के लिए उन्हें साइंस लैब भेजा गया और हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था।
इसके बावजूद हाइकोर्ट ने शुरुआती चरण में ही यह कहते हुए FIR रद्द की कि मामला केवल अटकलों पर आधारित है। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब दस्तावेजों की सत्यता की जांच जारी हो और महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाए जाने बाकी हों, तब इस स्तर पर FIR खत्म करना उचित नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जालसाजी साबित होने का आधार मुख्य रूप से हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
अदालत ने यह भी कहा कि जांच के इस प्रारंभिक चरण में निष्कर्ष निकालना और आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रोक देना कानून की प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए जांच जारी रखने का निर्देश दिया और कहा कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करे।