क्या गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है? सुप्रीम कोर्ट में मतभेद, बड़ी पीठ को मामला भेजने के संकेत

Update: 2026-07-09 08:05 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संकेत दिया कि वह इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर विचार करेगा कि क्या गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के फैसलों में विरोधाभास दिखाई देता है, इसलिए मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की आवश्यकता पड़ सकती है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की अवकाशकालीन पीठ मेघालय सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें सोनम रघुवंशी को मिली जमानत को चुनौती दी गई। सोनम पर अपने पति राजा रघुवंशी की कथित हत्या की साजिश रचने का आरोप है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज मिश्रा ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में स्पष्ट मतभेद है।

कोर्ट ने बताया कि पंकज बंसल मामले में कहा गया कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी को लिखित रूप में देना आवश्यक है।

इसके बाद डॉ. राजिंदर राजन मामले में भी यही सिद्धांत अपनाते हुए कहा गया कि सभी कानूनों के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है। वहीं विहान कुमार मामले में कहा गया कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी को बताए जाना जरूरी है, लेकिन उन्हें लिखित रूप में देना हर स्थिति में अनिवार्य नहीं है।

जस्टिस मनोज मिश्रा ने कहा,

"हम इस मामले पर विस्तार से विचार करेंगे। यह भी तय करेंगे कि क्या इसे बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। अलग-अलग समकक्ष पीठों के फैसलों के कारण कानून की स्थिति में टकराव उत्पन्न हो गया है।"

मेघालय सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वर्तमान मामले में आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए गए। हालांकि, गिरफ्तारी संबंधी दस्तावेज में टंकण त्रुटि के कारण भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 के स्थान पर गलती से धारा 403 अंकित हो गई, जबकि ऐसी कोई धारा अस्तित्व में ही नहीं है। उनका कहना था कि केवल इसी लिपिकीय त्रुटि के आधार पर निचली अदालतों ने जमानत दी।

इस पर जस्टिस मनोज मिश्रा ने कहा कि केवल धाराओं का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है। आरोपी को यह भी बताया जाना चाहिए कि उस पर किस प्रकार का आरोप है।

"सिर्फ धाराएं लिख देना पर्याप्त नहीं है। यह भी बताना होगा कि आप पर अपने पति की हत्या में शामिल होने का आरोप है और मामला किस प्रकृति का है।"

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई अगले मंगलवार तक के लिए स्थगित की। अदालत ने मेघालय सरकार को निर्देश दिया कि आरोपी को दिए गए मूल दस्तावेजों की स्पष्ट और पढ़ने योग्य प्रतियां रिकॉर्ड पर पेश की जाएं।

मामला

सोनम रघुवंशी और राजा रघुवंशी का विवाह 12 मई 2025 को हुआ था। 23 मई को दोनों मेघालय में हनीमून के दौरान लापता हो गए। बाद में उनकी किराये की स्कूटी लावारिस मिली और 2 जून को पूर्वी खासी हिल्स जिले में एक गहरी खाई से राजा रघुवंशी का शव बरामद हुआ।

सोनम 8 जून को वाराणसी-गाजीपुर मार्ग स्थित एक ढाबे के पास मिली। इसके बाद मेघालय पुलिस ने उसे और राज कुशवाहा को हत्या का मुख्य आरोपी बताया।

पुलिस का दावा है कि सोनम और उसके कथित प्रेमी ने पहले से साजिश रचकर हत्या की थी और इस मामले में 700 से अधिक पृष्ठों का आरोपपत्र भी दाखिल किया जा चुका है।

इससे पहले 3 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने सोनम को मिली जमानत पर तत्काल रोक लगाने से इनकार किया था। हालांकि अदालत ने मेघालय सरकार की चुनौती पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी थी।

वहीं हाईकोर्ट ने 29 जून को यह कहते हुए जमानत बरकरार रखी थी कि गिरफ्तारी संबंधी दस्तावेजों में बार-बार हुई त्रुटियां जांच की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

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