राज्य आयोग न बनने पर उपभोक्ता अपीलें सुनेंगे हाईकोर्ट: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

Update: 2026-02-14 11:13 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए छोटे राज्यों में उपभोक्ता आयोगों के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने उन राज्यों में, जहां लंबित मामलों की संख्या कम होने के कारण पूर्णकालिक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (State Consumer Disputes Redressal Commission) का गठन “व्यावहारिक नहीं” माना गया है, वहां हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को उपभोक्ता अपीलों की सुनवाई करने का अधिकार प्रदान किया है।

चीफ़ जस्टिस और जस्टिस जॉयमल्या बागची की खंडपीठ In Re: Pay and Allowance of the Members of the U.P. State Consumer Disputes Redressal Commission नामक स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले की सुनवाई कर रही थी।

छोटे राज्यों में कम लंबित मामले

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर रखा कि कई छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उपभोक्ता मामलों की संख्या बेहद कम है। उदाहरण के तौर पर:

अरुणाचल प्रदेश: कुल 59 मामले लंबित

सिक्किम: जिला आयोग में 52 और राज्य आयोग में 12 मामले

त्रिपुरा: चार जिला आयोगों में 316 और राज्य आयोग में 46 मामले, परंतु अध्यक्ष का पद रिक्त

मिजोरम: जिला आयोग में 82 और राज्य आयोग में 12 मामले, सदस्य अंशकालिक

मणिपुर: जिला आयोग में 123 और राज्य आयोग में 43 मामले

लक्षद्वीप: 10 से कम मामले, केरल राज्य आयोग के अध्यक्ष अतिरिक्त प्रभार में

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह: जिला आयोग में 37 और राज्य आयोग में 4 मामले

गोवा: राज्य आयोग में 39 मामले लंबित, परंतु योग्य अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं

कोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकांश राज्यों में या तो राज्य आयोग के पास उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश के रूप में आवश्यक योग्यता वाला अध्यक्ष नहीं है, या पर्याप्त मामलों के अभाव में आयोग का गठन ही नहीं हुआ है। इसके बावजूद, कुछ शिकायतें और अपीलें लंबित हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश

यह कहते हुए कि उपभोक्ता शिकायतें और वैधानिक अपीलें निष्प्रभावी (otiose) नहीं हो सकतीं और वादियों को निरुपाय नहीं छोड़ा जा सकता, कोर्ट ने निम्न निर्देश जारी किए:

संबंधित राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन दो सप्ताह के भीतर राज्य आयोगों के समक्ष लंबित सभी शिकायतें और अपीलें संबंधित क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को हस्तांतरित करें।

संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया गया कि वे इन मामलों को एकल न्यायाधीश को सौंपें, जो राज्य आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे। तकनीकी सदस्य उनकी सहायता करेंगे। मामलों का निस्तारण यथासंभव तीन महीने के भीतर किया जाए।

यदि ऐसे आदेशों के विरुद्ध राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) में अपील दायर की जाती है, तो उसके अध्यक्ष से अनुरोध किया गया कि वे ऐसे मामलों को अपनी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें, यह देखते हुए कि राज्य आयोग के अध्यक्ष के रूप में एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निर्णय दिया है।

वित्तीय बोझ की दलील

कई राज्यों ने यह तर्क दिया कि 19 मई 2025 के पूर्व आदेश के तहत पूर्णकालिक नियुक्तियां अनिवार्य करने से उनके खजाने पर अत्यधिक वित्तीय बोझ पड़ा है। इन आदेशों में संशोधन के लिए अंतरिम आवेदन दायर किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी ऐसे आवेदन 26 फरवरी 2026 को मुख्य मामलों के साथ सूचीबद्ध किए जाएं।

नियमों का अनुपालन और वैकल्पिक प्रस्ताव

पीठ ने स्पष्ट किया कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करें कि राज्य और जिला आयोगों की संरचना लागू नियमों के अनुरूप हो, जिसमें एक महिला सदस्य की अनिवार्य नियुक्ति भी शामिल है।

साथ ही, जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लंबित मामलों की संख्या 1000 से कम है, उन्हें उपभोक्ता शिकायत निवारण तंत्र को प्रभावी बनाने के लिए वैकल्पिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है।

कोर्ट ने भारत के सॉलिसिटर जनरल से भी सहयोग मांगा और निर्देश दिया कि उनके कार्यालय को 19 मई 2025 के आदेश की प्रति उपलब्ध कराई जाए, विशेषकर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 102(1) के तहत केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए मॉडल नियमों के संदर्भ में।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 की शक्ति का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि छोटे राज्यों में भी उपभोक्ताओं को न्याय सुलभ रहे और वैधानिक अपीलों का प्रभावी निस्तारण हो सके।

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