जमानत खारिज होने के बाद भी लगातार गिरफ्तारी के खिलाफ Habeas Corpus याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

Update: 2026-07-02 07:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करेगा कि क्या किसी व्यक्ति की लगातार गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका, उसकी जमानत याचिका खारिज होने के बाद भी सुनवाई योग्य हो सकती है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की अवकाशकालीन पीठ ने हाजी अब्दुल रज्जाक की याचिका पर नोटिस जारी किया। रज्जाक का दावा है कि वह अगस्त 2021 से हिरासत में है और गिरफ्तारी के लिखित आधार (Grounds of Arrest) उसे कभी उपलब्ध नहीं कराए गए, जबकि कानून ऐसा करना अनिवार्य बनाता है।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी कि उनकी जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra के फैसले के अनुसार गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

वहीं, राज्य की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि हाईकोर्ट पहले ही हिरासत को वैध ठहरा चुका है और जमानत खारिज होने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

हालांकि, जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि जमानत खारिज होने के अलावा इस मामले में कानून के व्यापक प्रश्न भी उठते हैं, जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है। इसके बाद पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी कर दिया।

याचिका के अनुसार, रज्जाक को पहले हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) के मामले में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत तीन बार निरोधात्मक आदेश जारी किए गए, जिन्हें बाद में राज्य सलाहकार बोर्ड की मंजूरी न मिलने पर निरस्त कर दिया गया। रज्जाक का आरोप है कि जब भी उसकी रिहाई की संभावना बनती है, उसके खिलाफ नया मामला दर्ज कर या अन्य कार्रवाई कर उसे लगातार हिरासत में रखा जाता है।

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि उसके और उसके परिवार के खिलाफ बैंक खाते फ्रीज करने, खनन गतिविधियां रोकने और ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई कर कार्यपालिका की शक्तियों का दुरुपयोग किया गया। उसका कहना है कि उसकी याचिका केवल किसी एक गिरफ्तारी को नहीं, बल्कि लगातार गिरफ्तारी और निरोधात्मक कार्रवाई के जरिए जारी हिरासत की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती है।

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