सतनाथ उपाध्याय के चुनाव को चुनौती देने वाली सोमनाथ भारती की अपील पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-17 07:23 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सोमनाथ भारती की उस अपील पर सुनवाई के लिए सहमति दी, जिसमें उन्होंने वर्ष 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मालवीय नगर सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सतीश उपाध्याय के निर्वाचन को चुनौती दी है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और सीनियर एडवोकेट मनींदर सिंह की संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद अपील स्वीकार की।

सोमनाथ भारती की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी चुनाव याचिका यह कहते हुए खारिज की थी कि उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार जितेंद्र कुमार कोचर को आवश्यक पक्षकार नहीं बनाया, जबकि यह निष्कर्ष कानूनन गलत है।

भारती ने अपनी चुनाव याचिका में आरोप लगाया कि चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्ट आचरण अपनाया गया। उनका दावा था कि भाजपा उम्मीदवार ने उन्हें नुकसान पहुंचाने और वोटों का बंटवारा कराने के उद्देश्य से कांग्रेस उम्मीदवार को आर्थिक सहायता दी। हालांकि, उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को प्रतिवादी नहीं बनाया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने पूछा,

"क्या कोचर किसी अन्य उम्मीदवार की श्रेणी में आते हैं?"

इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि ऐसा तभी माना जा सकता है, जब संबंधित उम्मीदवार की सहमति हो। उन्होंने कहा कि इस मामले में कांग्रेस उम्मीदवार की ओर से किसी प्रकार की सहमति का आरोप नहीं है, इसलिए उन्हें आवश्यक पक्षकार नहीं माना जा सकता।

उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(1)(क) का हवाला देते हुए कहा कि रिश्वत तभी भ्रष्ट आचरण मानी जाएगी, जब उम्मीदवार या उसके अभिकर्ता की सहमति से ऐसा किया गया हो। चूंकि कोचर की सहमति का कोई आरोप नहीं है, इसलिए उन्हें याचिका में पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं था।

गौरतलब है कि सोमनाथ भारती जो मालवीय नगर से तीन बार विधायक और दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री रह चुके हैं, ने सतीश उपाध्याय के निर्वाचन को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की। सतीश उपाध्याय ने यह चुनाव 2,131 मतों के अंतर से जीता था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 जनवरी को याचिका खारिज करते हुए कहा था कि जिस उम्मीदवार के खिलाफ भ्रष्ट आचरण के आरोप लगाए गए हों, उसे पक्षकार न बनाना ऐसा दोष है, जिसे बाद में दूर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि चुनाव कानून अपने आप में पूर्ण संहिता है और 45 दिनों की वैधानिक समय-सीमा समाप्त होने के बाद इस प्रकार की त्रुटि को संशोधन के जरिए ठीक नहीं किया जा सकता।

अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले की वैधता पर विचार करेगा।

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