दिल्ली में छात्र-प्रदर्शन के दौरान 17 मेट्रो स्टेशन बंद करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में छात्र प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली मेट्रो के 17 स्टेशनों को बंद करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में स्टेशनों को बंद करने की कार्रवाई को अवैध और असंगत (Disproportionate) बताते हुए कहा गया कि सार्वजनिक सुविधा को प्रदर्शन रोकने के लिए बंद करने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है।
मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) से भी जवाब मांगा है।
'मामला प्रदर्शनकारियों के अधिकारों का नहीं'
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट संजीव नरंग ने कहा कि मामला केवल प्रदर्शन करने के अधिकार का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि किस संवैधानिक और कानूनी आधार पर किसी सार्वजनिक सुविधा को बंद किया जा सकता है।
याचिका में दावा किया गया कि मेट्रो स्टेशन बंद करने का निर्णय अनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) का उल्लंघन करता है। दलील दी गई कि संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाते समय सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाया जाना चाहिए।
इसके लिए Anuradha Bhasin और In Re: Ramlila Maidan Incident मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अनुपातिकता के सिद्धांतों का हवाला दिया गया।
'मेट्रो स्टेशन बंद करने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं'
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मेट्रो स्टेशन बंद करने के लिए कोई विशेष वैधानिक प्रावधान नहीं था। उनके मुताबिक, स्टेशन बंद करने का कोई औपचारिक आदेश भी जारी नहीं किया गया, बल्कि जनता को X (पूर्व में Twitter) पर पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी गई।
वकील ने Metro Railways (Operation and Maintenance) Act का हवाला देते हुए कहा कि प्रदर्शन के कारण मेट्रो स्टेशन बंद करने की शक्ति इस कानून में नहीं दी गई है।
उन्होंने कहा, पुलिस प्रदर्शन को नियंत्रित कर सकती है, लेकिन किसी सार्वजनिक सुविधा को बंद करने का आदेश नहीं दे सकती। साथ ही, प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने के लिए एक Standard Operating Procedure (SOP) बनाने की मांग की गई।
जस्टिस बागची- कानून-व्यवस्था के मामलों में कोर्ट सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि कानून-व्यवस्था के संदर्भ में लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करना आम तौर पर पुलिस अधिकारियों द्वारा संबंधित कानूनों के तहत किया जाता है।
उन्होंने कहा कि अदालतें परंपरागत रूप से कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में कार्यपालिका के फैसलों को सम्मान देती रही हैं।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कार्यपालिका द्वारा इस्तेमाल किया गया विवेक अनुपातहीन हो जाता है, तब अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
अब सुप्रीम कोर्ट यह जांच करेगा कि 17 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का फैसला किन परिस्थितियों में और किस तरह कार्यपालिका के विवेक का इस्तेमाल करते हुए लिया गया था।
कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।