सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से आग्रह: जनगणना 2027 में जाति की आत्म-घोषणा पर उठी चिंताओं की करे जांच
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और जनगणना संचालन निदेशालय को निर्देश दिया कि वे आगामी जनगणना 2027 में जाति गणना को केवल आत्म-घोषणा (self-declaration) के बजाय सत्यापन योग्य तंत्र के आधार पर करने संबंधी याचिकाकर्ता के सुझाव पर विचार करें।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की खंडपीठ ने यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता ने “प्रासंगिक मुद्दा” उठाया है, इस विषय पर न्यायिक हस्तक्षेप से परहेज़ किया। खंडपीठ ने कहा कि यह मामला जनगणना अधिनियम, 1958 के तहत संबंधित प्राधिकरणों द्वारा देखा जाना चाहिए।
यह जनहित याचिका आकाश गोयल द्वारा दायर की गई थी, जिसमें प्रस्तावित जनगणना 2027 में जाति गणना के लिए बिना सत्यापन की आत्म-घोषणा पर निर्भरता को लेकर चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने स्पष्ट किया कि उन्हें जाति जनगणना से आपत्ति नहीं है, बल्कि यह आपत्ति है कि यह प्रक्रिया केवल आत्म-घोषणा पर आधारित न हो। उनका तर्क था कि जाति संबंधी डेटा दीर्घकालिक प्रभाव वाला होता है और बिना सत्यापन एकत्र किया गया डेटा हानिकारक हो सकता है। यह भी बताया गया कि याचिका दायर होने के बाद एक अधिसूचना जारी की गई, जिसमें केवल आत्म-घोषणा की अनुमति दी गई है।
वकील ने आगे कहा कि जाति जनगणना पर ₹13,500 करोड़ से अधिक का व्यय आएगा और इसका कल्याणकारी योजनाओं पर सीधा असर पड़ेगा। ऐसे में पद्धति में पारदर्शिता का अभाव नीतिगत निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि जनगणना किस प्रकार की जाए, यह राज्य का नीतिगत विषय है, और पूछा कि क्या इस संबंध में प्राधिकरणों के समक्ष कोई प्रतिनिधित्व किया गया है। वकील ने बताया कि आत्म-घोषणा की अनुमति देने वाली अधिसूचना जारी होने के बाद ही रिट याचिका दाखिल की गई।
खंडपीठ ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता की इस शिकायत को दर्ज किया कि जाति डेटा दर्ज करने और वर्गीकृत करने के संबंध में कोई दिशानिर्देश, प्रश्नावली या पारदर्शी कार्यप्रणाली सार्वजनिक डोमेन में नहीं रखी गई है। अदालत ने यह भी नोट किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से आगे बढ़कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को पहली बार जनगणना अभ्यास में शामिल किया जा रहा है, लेकिन जाति पहचान के मानदंड स्पष्ट नहीं किए गए हैं।
हालांकि, खंडपीठ ने यह भी कहा कि जनगणना जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके अंतर्गत बने नियमों द्वारा विनियमित है, और कानून प्राधिकरणों को जनगणना कराने की पद्धति तय करने का अधिकार देता है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की, “इसमें संदेह का कोई कारण नहीं है कि प्रतिवादी प्राधिकरणों ने क्षेत्र विशेषज्ञों की सहायता से किसी त्रुटि से बचने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया होगा। फिर भी, याचिकाकर्ता ने कुछ प्रासंगिक मुद्दे उठाए हैं।”
अंततः, अदालत ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादी प्राधिकरणों को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सुझावों और मुद्दों पर विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही, यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता उचित समझे तो वह अपनी याचिका की एक प्रति पूरक प्रतिनिधित्व के रूप में संबंधित प्राधिकरणों को भेज सकता है।