जमानत चरण पर साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन अस्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-02-24 10:22 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि जमानत आवेदन पर विचार करते समय साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण या मूल्यांकन करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने हत्या और एससी/एसटी अधिनियम से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ द्वारा आरोपियों को दी गई जमानत को रद्द कर दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने मुकदमे से पहले ही मेडिकल साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर टिप्पणी कर गलती की।

मेडिकल साक्ष्य पर टिप्पणी अनुचित

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना की तारीख और मृतक की मृत्यु के बीच समय अंतराल जैसे मुद्दों पर विचार ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्य के मूल्यांकन के समय किया जाना चाहिए, न कि जमानत चरण पर।

 गंभीर अपराध में जमानत देने का आधार नहीं

खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट जमानत आदेश में हस्तक्षेप कर सकता है यदि:

अपराध की प्रकृति और गंभीरता की अनदेखी की गई हो

रिकॉर्ड पर उपलब्ध महत्वपूर्ण सामग्री को नजरअंदाज किया गया हो

आदेश अप्रासंगिक विचारों पर आधारित हो

अदालत ने पाया कि मृतक के शरीर पर कई गंभीर चोटें थीं, जिनमें एक चोट से गहरा मस्तिष्कीय नुकसान हुआ था, फिर भी आरोपियों को जमानत दे दी गई।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

अदालत ने हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द करते हुए:

आरोपियों को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया

 ट्रायल कोर्ट को एक वर्ष के भीतर मुकदमा पूरा करने का आदेश दिया

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत सुनवाई का उद्देश्य साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन नहीं बल्कि केवल प्रारंभिक दृष्टि से मामले की गंभीरता का आकलन करना है।

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