दरगाह के सज्जादानशीन और वक्फ के मुतवल्ली एक जैसे नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-07 06:24 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि दरगाह के सज्जादानशीन का पद वक्फ के मुतवल्ली के पद से मूल रूप से अलग है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सज्जादानशीन का पद मुख्य रूप से एक आध्यात्मिक पद है, जबकि मुतवल्ली का पद एक धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक भूमिका है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक की दरगाह के सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़े एक विवाद पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की।

बेंच ने कहा:

"ऊपर की गई चर्चा को देखते हुए मुतवल्ली और सज्जादानशीन के पदों को एक जैसा नहीं कहा जा सकता। वक्फ का सज्जादानशीन, अगर वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 32(2)(g) के तहत नियुक्त किया गया हो तो वह मुतवल्ली के काम भी कर सकता है। हालांकि, धारा 32(2)(g) के तहत नियुक्त मुतवल्ली सज्जादानशीन के तौर पर काम नहीं कर सकता, बल्कि वह केवल अधिनियम और नियमों के तहत तय किए गए कर्तव्यों का ही पालन कर सकता है। सज्जादानशीन वक्फ का आध्यात्मिक प्रमुख होता है और सज्जादानशीन की घोषणा एक धार्मिक मामला है; जबकि, वक्फ के मुतवल्ली की भूमिका केवल वक्फ के प्रशासन और प्रबंधन से संबंधित होती है।"

कोर्ट चन्नापटना में स्थित हज़रत अखिल शाह कादरी दरगाह के सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार के मुद्दे पर विचार कर रहा था। इसमें प्रतिवादी नंबर 1 ने यह तर्क दिया कि सिविल कोर्ट के पास इस मामले पर सुनवाई का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है, क्योंकि यह संपत्ति एक अधिसूचित वक्फ है और यह मुद्दा वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आता है। हाईकोर्ट ने इन पहलुओं पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि किसी अधिसूचित वक्फ संस्था के सज्जादानशीन को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड के पास है।

दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि मुतवल्ली का पद सज्जादानशीन के पद जैसा नहीं है। यह देखा गया कि यह मामला किसी दरगाह के सज्जादानशीन की नियुक्ति से जुड़ा था, न कि मुतवल्ली की; और हाईकोर्ट ने अधिकार क्षेत्र की कमी के आधार पर ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को रद्द करके ग़लती की थी।

निष्कर्ष के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया और ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को बहाल किया। इस मामले को हाईकोर्ट को वापस भेज दिया गया ताकि वह इस पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे। साथ ही यह अनुरोध किया गया कि इसका निपटारा जल्द से जल्द (हो सके तो 9 महीने के भीतर) किया जाए।

सज्जादानशीन की नियुक्ति को लेकर विवाद

बेंच ने यह टिप्पणी की कि धार्मिक पदों पर उत्तराधिकार आमतौर पर रीति-रिवाजों, प्रथाओं या मौजूदा पदाधिकारी द्वारा नामांकन के आधार पर तय होता है। बेंच ने कहा कि मुस्लिम धार्मिक संस्थानों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि सज्जादानशीन या मुतवल्ली के पद उत्तराधिकार के सख़्त नियमों के बजाय, उस संस्थान के स्थापित रीति-रिवाजों के अनुसार (जिसमें पूर्ववर्ती द्वारा नामांकन भी शामिल है) हस्तांतरित हो सकते हैं।

बेंच ने एक संबंधित अपील पर भी फ़ैसला सुनाया, जो कर्नाटक के चामराजनगर ज़िले में स्थित हज़रत मर्दाने-ए-ग़ैब दरगाह, शिवसमुद्रम के सज्जादानशीन के पद पर उत्तराधिकार से जुड़ी थी।

मूल सज्जादानशीन ने अपने सबसे बड़े बेटे को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। हालांकि, बेटे की मृत्यु उसके पिता से पहले ही हो गई। इसके बाद 1981 के 'ख़िलाफ़तनामा' के अनुसार, मूल सज्जादानशीन ने प्रतिवादी नंबर 1—अपने पोते (दिवंगत बेटे के बेटे)—को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। वर्ष 1988 में मूल सज्जादानशीन का निधन हो गया और प्रतिवादी नंबर 1 ने पदभार ग्रहण कर लिया। हालांकि, अपीलकर्ता (जो मूल सज्जादानशीन का सबसे छोटा बेटा था) ने 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' एक हस्तलिखित 'ख़िलाफ़तनामा' आदि के आधार पर इस नियुक्ति के ख़िलाफ़ अपना दावा पेश किया।

ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 1—सैयद मोहम्मद आदिल पाशा क़ादरी—के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और उन्हें दरगाह का वैध सज्जादानशीन घोषित कर दिया। अदालतों ने प्रतिवादी नंबर 1 के पक्ष में यह तर्क दिया कि यह पद प्रकृति से ही वंशानुगत है।

अपीलकर्ता द्वारा दायर की गई नियमित अपीलों और नियमित द्वितीय अपीलों को अपीलीय न्यायालय/हाईकोर्ट द्वारा ख़ारिज किया गया। हाईकोर्ट ने भी इस बात से सहमति जताई कि यह उत्तराधिकार प्रकृति से वंशानुगत है और नामांकन की प्रक्रिया द्वारा संचालित होता है। इसमें आगे यह भी कहा गया कि 1981 का 'खिलाफ़तनामा' विधिवत रूप से साबित हो गया, जबकि अपीलकर्ता द्वारा जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया गया, उनसे 'सज्जादानशीनी' का अधिकार प्राप्त नहीं होता था। इससे व्यथित होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने 2009 में 'यथास्थिति' (status quo) बनाए रखने का निर्देश दिया।

इस फ़ैसले के ज़रिए, सबूतों की जाँच करने और दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट को अपील करने वाले की इस दलील में कोई दम नहीं लगा कि 1981 का ख़िलाफ़तनामा एक मनगढ़ंत दस्तावेज़ था। कोर्ट ने कहा कि हालांकि दस्तावेज़ में "सज्जादानशीन" शब्द का साफ़ तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया। फिर भी इससे मूल सज्जादानशीन का यह इरादा ज़ाहिर होता था कि वह अपनी आध्यात्मिक सत्ता प्रतिवादी नंबर 1 को सौंपना चाहता था।

कोर्ट ने अपील करने वाले की उन दलीलों को भी सबूतों की कमी के चलते ख़ारिज किया, जिनमें कहा गया कि उत्तराधिकार सिर्फ़ जीवित बेटे को ही मिलता है। इसके विपरीत, कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के सामने ऐसे सबूत मौजूद थे, जिनसे मौजूदा सज्जादानशीन द्वारा किसी उत्तराधिकारी को नामित किए जाने की बात को समर्थन मिलता था।

जहां तक अपील करने वाले द्वारा GPA (आम मुख़्तारनामा) पर भरोसा करने की बात है, कोर्ट ने फ़ैसला दिया,

"कोई भी ऐसा दस्तावेज़, जो किसी दूसरे व्यक्ति को सिर्फ़ दस्तावेज़ पर दस्तख़त करने वाले की ओर से काम करने का अधिकार देता हो, उसे सज्जादानशीन जैसे किसी आध्यात्मिक पद का उत्तराधिकार सौंपने वाला दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।"

खास बात यह है कि अपील करने वाले ने यह दलील भी दी थी कि प्रतिवादी नंबर 1 को सज्जादानशीन के तौर पर मान्यता देने से वक़्फ़ की संपत्ति में परिवार के दूसरे सदस्यों या हिस्सेदारों के अधिकार ख़त्म हो जाएंगे।

इस बारे में कोर्ट ने कहा,

"किसी एक व्यक्ति को सज्जादानशीन के तौर पर मान्यता देने से वक़्फ़ क़ानून के तहत दूसरे लाभार्थियों के स्वतंत्र क़ानूनी अधिकार न तो तय होते हैं और न ही ख़त्म होते हैं।"

आखिरकार, यह फ़ैसला दिया गया कि हाईकोर्ट के सामने क़ानून का कोई सवाल ही नहीं उठा और कोर्ट ने अपील करने वाले की अपील ख़ारिज की। अंतरिम आदेश (मौजूदा स्थिति बनाए रखने के आदेश) रद्द कर दिए गए।

Case Title: SYED MOHAMMED GHOUSE PASHA KHADRI versus SYED MOHAMMED ADIL PASHA KHADRI & ORS. ETC., CIVIL APPEAL NOS. 13345 - 13346 OF 2015

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