S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-10 14:15 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक वादी को किसी मृतक द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार पाने से अयोग्य घोषित किया। कोर्ट ने यह पाया कि वह वादी, उस मृतक की हत्या के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद है।

कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) की धारा 25 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वादी को अयोग्य घोषित किया। यह धारा यह प्रावधान करती है कि जो व्यक्ति किसी की हत्या करता है, या हत्या करने में किसी की मदद करता है, वह मारे गए व्यक्ति की संपत्ति का उत्तराधिकार पाने से अयोग्य हो जाएगा।

धारा 25 के तहत लगाई गई यह रोक उस व्यक्ति पर लागू होती है, जो वसीयत के आधार पर (Testamentary Succession) मृतक की संपत्ति का उत्तराधिकार पाना चाहता है।

कोर्ट ने यह तर्क दिया,

"किसी भी व्यक्ति को अपने ही गलत काम से लाभ उठाने या फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह सिद्धांत 'ex turpi causa non oritur actio' (गलत काम से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता) नामक कहावत में और इस नियम में झलकता है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही गलत काम से लाभ नहीं उठा सकता।"

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि धारा 25 के तहत रोक लागू होने के लिए किसी वास्तविक दोषसिद्धि (Conviction) की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह प्रावधान दोषसिद्धि को एक अनिवार्य शर्त नहीं बनाता है।

कोर्ट ने कहा,

"यह प्रावधान गलत काम करने वाले व्यक्ति पर दीवानी परिणाम (Civil Consequence) लागू करता है। इस मुद्दे की जांच 'संभावनाओं की प्रबलता' (Preponderance of Probabilities) के मानक पर की जा सकती है। इसके लिए आपराधिक मुकदमों में लागू होने वाले सख्त सबूतों के मानक की आवश्यकता नहीं है।"

मामले की पृष्ठभूमि

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में वादी, जो विवादित संपत्ति का वास्तविक मालिक था (हालांकि संपत्ति मृतक के. रघुनाथ के नाम पर खरीदी गई थी), उसने मृतक द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई कथित वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार मांगा।

वादी ने मृतक द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अपना हक और स्वामित्व घोषित करवाने के लिए मुकदमा दायर किया। प्रतिवादी ने इस मुकदमे का विरोध करते हुए CPC के आदेश VII नियम 11(d) के तहत एक आवेदन दायर किया। प्रतिवादी ने यह मांग की कि वादी का मुकदमा खारिज किया जाए, क्योंकि यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के तहत वर्जित है, क्योंकि वादी उस मृतक की हत्या के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद है, जो विवादित संपत्ति का 'दिखावटी मालिक' (Ostensible Owner) है, और जिससे वादी उत्तराधिकार पाने की मांग कर रहा है।

ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी की वह मांग स्वीकार की, जिसमें उसने वादी का मुकदमा खारिज करने की अपील की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले को पलट दिया, जिसके बाद प्रतिवादी सुप्रीम कोर्ट चले गए।

फ़ैसला

हाईकोर्ट का फ़ैसले रद्द करते हुए जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में ट्रायल कोर्ट का वह फ़ैसला बहाल किया, जिसमें केस की शुरुआत में ही याचिका खारिज की गई थी, क्योंकि HSA की धारा 25 के तहत याचिका कानूनन वर्जित थी।

कोर्ट ने कहा,

“इस मामले में वादी पर के. रघुनाथ की हत्या का आरोप है और कहा गया कि CBI जांच अभी चल रही है। वादी ने अपनी दलीलों में इस बात को छिपाया है। हम पहले ही यह मान चुके हैं कि जो व्यक्ति ज़रूरी तथ्यों को छिपाने का दोषी है, उसे अपनी बात रखने का अधिकार नहीं है और उसकी याचिका भी खारिज किए जाने लायक है।”

कोर्ट ने आगे कहा,

“हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत लगी रोक, बिना वसीयत और वसीयत के ज़रिए होने वाले, दोनों तरह के उत्तराधिकार पर लागू होती है। जिस व्यक्ति पर उस व्यक्ति की हत्या का आरोप है, जिससे वह विरासत का दावा कर रहा है, वह न केवल धारा 25 के तहत, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों के आधार पर भी अपने अधिकारों का दावा करने का हकदार नहीं है। दीवानी मामलों में पक्के सबूत ज़रूरी नहीं होते, अगर संभावनाओं का पलड़ा अपराध होने की ओर इशारा करता हो...”

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

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