PMLA | ED का गिरफ्तारी का आदेश एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को भेजने में देरी से गिरफ्तारी अपने-आप गैर-कानूनी नहीं हो जाती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के कथित अपराध में गिरफ्तारी के समय, अगर गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी गिरफ्तारी का आदेश और उससे जुड़े कागजात एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को तुरंत नहीं भेज पाता है तो भी देरी की वाजिब वजह होने पर गिरफ्तारी गैर-कानूनी नहीं मानी जाएगी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जब मनमानी गिरफ्तारी से बचाने वाले मुख्य नियमों का पालन किया गया हो - जैसे कि अधिकृत अधिकारी के पास सबूत हों, विश्वास करने के कारण लिखित में दर्ज हों, गिरफ्तारी के आधार बताए गए हों और आरोपी को 24 घंटे के भीतर सक्षम अदालत के सामने पेश किया गया हो - तो धारा 19(2) का पालन करने में हुई मामूली देरी कोई खास मायने नहीं रखती।
कोर्ट ने समझाया कि चूंकि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 19(2) गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को गिरफ्तारी के आदेश और अपने पास मौजूद सबूतों की कॉपी 'तुरंत' एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को भेजने का निर्देश देती है, इसलिए कोई समय-सीमा न बताए जाने के कारण, "तुरंत" शब्द का मतलब "24 घंटे के भीतर या किसी तय समय-सीमा के भीतर" नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि सबूतों को तेज़ी से और साथ-साथ भेजा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"PMLA में गिरफ्तारी के आदेश और अपने पास मौजूद सबूतों को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को भेजने के लिए कोई समय-सीमा नहीं बताई गई। इसे 'तुरंत' किया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि "जब मामले के रिकॉर्ड हज़ारों पन्नों के हों, तो गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को उन्हें भेजने में कुछ समय लगना स्वाभाविक है।"
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी PMLA मामले में आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज करने के कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आई।
आरोपी ने दावा किया कि एक्ट की धारा 19(2) का पालन न किए जाने के कारण उसकी गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी। उसके अनुसार, गिरफ्तारी के आदेश और गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी के पास मौजूद सबूतों को उसकी गिरफ्तारी के पांच दिन बाद एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को भेजा गया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक्ट में इस्तेमाल किए गए शब्द 'तुरंत' (Immediately) का मतलब यह निकाला जाना चाहिए कि गिरफ्तारी के साथ ही जानकारी आगे भेजी जानी चाहिए।
इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार के फैसले में एजेंसी के सामने आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों पर ध्यान दिया गया। एजेंसी को सबूत इकट्ठा करने, उन्हें व्यवस्थित करने और आगे भेजने के लिए संकलित करने में काफी समय लग सकता है, क्योंकि कभी-कभी ये दस्तावेज़ सैकड़ों पन्नों के होते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"जब कोई जांच एजेंसी सबूत इकट्ठा कर रही होती है, उन्हें व्यवस्थित कर रही होती है और आगे भेजने के लिए संकलित कर रही होती है तो कुछ प्रशासनिक ज़रूरतें पूरी करनी पड़ सकती हैं, जिनमें कुछ दिन लग सकते हैं। इसलिए, इस तर्क में कोई दम नहीं है कि पांच दिन की देरी से गिरफ्तारी की वैधता पर ही सवाल उठ जाएगा।"
कोर्ट ने आगे कहा कि आदर्श रूप से जानकारी आगे भेजने का काम गिरफ्तारी के साथ ही होना चाहिए; लेकिन किसी ज़रूरी वजह से हुई देरी को "एक्ट की धारा 19(2) का उल्लंघन नहीं माना जा सकता"।
तेज़ सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर ज़मानत दी गई
कोर्ट ने ध्यान दिया कि इस मामले में कुल 97 आरोपी, 48 अभियोजन पक्ष के गवाह और लगभग 15,000 पन्नों के दस्तावेज़ शामिल हैं, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ़ जांच अभी भी लंबित है। अपीलकर्ता-आरोपी को ज़मानत देना उचित समझा गया क्योंकि वह 20 महीने से ज़्यादा समय से हिरासत में था (जबकि उस अपराध के लिए अधिकतम सज़ा 7 साल है) और उसके खिलाफ़ जांच पूरी हो चुकी थी।
कोर्ट ने कहा,
"अब आरोपी को जेल में रखने का कोई मकसद नहीं है।"
कोर्ट ने 'मनीष सिसोदिया बनाम डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट, 2024 LiveLaw (SC) 563' मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि अगर जांच एजेंसियां तेज़ सुनवाई सुनिश्चित नहीं कर सकतीं, तो वे अपराध की गंभीरता का हवाला देकर ज़मानत का विरोध नहीं कर सकतीं।
कोर्ट ने कहा,
"अगर लंबे समय तक जेल में रखा जाना जारी रहता है, तो आरोपी को मिले संवैधानिक सुरक्षा उपाय बेकार हो जाएंगे।"
Case Title : SANJAY SUREKA @SANJAY KUMAR SUREKA VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT