पेंशन के लिए एड-हॉक सर्विस गिनी जा सकती है, लेकिन सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों के मुकाबले सीनियरिटी का दावा नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्थायी या एड-हॉक (कामचलाऊ) तौर पर नियुक्त कर्मचारी, सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों के साथ सीनियरिटी तय करने के मामले में बराबरी का दावा नहीं कर सकते। असल में, एड-हॉक या अस्थायी कर्मचारियों की सीनियरिटी उनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से नहीं, बल्कि सर्विस में पक्के (कन्फर्म) होने की तारीख से तय होगी।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने कहा कि हालांकि एड-हॉक सर्विस को पेंशन के मकसद से ध्यान में रखा जा सकता है, लेकिन सीनियरिटी तय करने के लिए इसे नहीं गिना जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...सीधे भर्ती हुए कर्मचारी को नियुक्ति की तारीख से सीनियरिटी का दावा करने का हक है और उसकी सीनियरिटी सर्विस में पक्के होने की तारीख के आधार पर तय नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी अस्थायी या एड-हॉक है और नियमों के तहत नियुक्त नहीं हुआ था, बल्कि एक कामचलाऊ व्यवस्था के तहत रखा गया, तो वह शुरुआती नियुक्ति की तारीख से सीनियरिटी का दावा नहीं कर सकता। कानून में यह स्थिति आज भी बनी हुई है। हालांकि, ऐसे फैसले भी हैं, जिनमें इस कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी की एड-हॉक या अस्थायी पद पर की गई सर्विस का फायदा रेगुलर होने की तारीख तक दिया है, लेकिन सिर्फ पेंशन के मकसद से।"
यह विवाद 1981-83 के दौरान तमिलनाडु सरकार द्वारा मिनिस्ट्रियल पदों पर भर्ती पर लगी रोक के समय की गई अस्थायी नियुक्तियों से शुरू हुआ था। एम. प्रेमा और अन्य कर्मचारियों को तमिलनाडु राज्य और अधीनस्थ सेवा नियम, 1955 के नियम 10(a)(i) के तहत नियुक्त किया गया।
इस बीच तमिलनाडु लोक सेवा आयोग ने नवंबर 1983 में ग्रुप IV पदों के लिए एक प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की, जिसमें चुने गए उम्मीदवारों को 1985 और 1987 के बीच नियुक्त किया गया।
बाद में राज्य सरकार ने इन विशेष नियुक्त कर्मचारियों को 26 जून 1984 से रेगुलर कर दिया। विशेष अवशोषण नियम (Special Absorption Rules), 1987 के क्लॉज 10 में यह प्रावधान है कि ये कर्मचारी 1983 बैच के सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों से नीचे माने जाएंगे, चाहे उनकी नियुक्ति की तारीख कुछ भी रही हो। एक अलग विवाद 'दया के आधार पर नियुक्त' (Compassionate Appointees) एस. प्रेम कुमार और टी.ए. कन्नाप्पा से जुड़ा था, जिन्हें क्रमशः अगस्त और नवंबर 1985 में जूनियर असिस्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया और बाद में उनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से ही रेगुलर कर दिया गया।
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि सीधे भर्ती होने वाले (Direct Recruits) कर्मचारी, विशेष तौर पर नियुक्त कर्मचारियों से सीनियर होंगे, लेकिन सीधे भर्ती होने वाले और दया के आधार पर नियुक्त कर्मचारियों के बीच सीनियरिटी उनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख पर निर्भर करेगी। विशेष तौर पर नियुक्त कर्मचारियों ने क्लॉज़ 10 की वैधता को चुनौती दी, जबकि सीधे भर्ती होने वाले कर्मचारियों ने दया के आधार पर नियुक्त कर्मचारियों को उनसे ऊपर रखे जाने पर आपत्ति जताई।
जस्टिस चंद्रशेखर के फैसले में 'डायरेक्ट रिक्रूट क्लास II इंजीनियरिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में भर्ती नियमों के तहत की गई रेगुलर नियुक्तियों और काम-चलाऊ व्यवस्था के तौर पर की गई अस्थायी या एड-हॉक नियुक्तियों के बीच अंतर बताया गया।
कोर्ट ने फिर से कहा कि सीधे भर्ती होने वाला कर्मचारी नियुक्ति की तारीख से सीनियरिटी का दावा कर सकता है और सर्विस में कन्फर्मेशन (पक्की नौकरी) होने तक सीनियरिटी को टाला नहीं जा सकता। इसके विपरीत, तय भर्ती नियमों के बाहर अस्थायी या एड-हॉक आधार पर नियुक्त कर्मचारी आमतौर पर शुरुआती नियुक्ति की तारीख से सीनियरिटी का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा,
"सीनियरिटी का यह एक बुनियादी नियम है कि सही प्रक्रिया और नियमों के पालन के साथ किसी पद पर नियुक्त सरकारी कर्मचारी, उन कर्मचारियों से सीनियर होगा जो अस्थायी या काम-चलाऊ व्यवस्था के तौर पर या किसी इमरजेंसी की वजह से सर्विस में आए।"
कोर्ट ने कहा कि कानून की यह स्थिति वैसी ही बनी हुई है। हालांकि, कुछ मामलों में रेगुलर होने से पहले एड-हॉक या अस्थायी तौर पर की गई सर्विस को माना गया, लेकिन यह फायदा पेंशन के मकसद से दिया गया। इससे कर्मचारी को रेगुलर भर्ती हुए कर्मचारियों के मुकाबले सीनियरिटी का हक अपने-आप नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने कहा,
"...स्पेशल तौर पर नियुक्त लोगों या 'कम्पैशनेट' (दया के आधार पर) नियुक्त लोगों की एड-हॉक या अस्थायी कर्मचारी के तौर पर की गई पिछली सर्विस को सीधे भर्ती हुए लोगों (डायरेक्ट रिक्रूट्स) के मुकाबले सीनियरिटी देने के लिए नहीं गिना जा सकता..."
'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त व्यक्ति को सीधे और स्पेशल तौर पर नियुक्त लोगों के मुकाबले सीनियरिटी नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले से असहमति जताई जिसमें 'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त व्यक्ति को सीधे और स्पेशल तौर पर नियुक्त लोगों के मुकाबले सीनियरिटी दी गई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त लोगों को सिर्फ इसलिए सीधे भर्ती हुए लोगों से ऊपर नहीं रखा जा सकता क्योंकि उनकी नियुक्ति पहले हुई। कोर्ट ने माना कि 'कम्पैशनेट' नियुक्ति संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का अपवाद है और अस्थायी कर्मचारियों के बाद में रेगुलर होने से सीधे भर्ती हुए कर्मचारी जूनियर नहीं हो सकते।
कोर्ट ने कहा,
"इस फैसले के कारण सीनियरिटी लिस्ट में 'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त लोगों को सीधे भर्ती हुए लोगों और स्पेशल तौर पर नियुक्त लोगों से ऊपर रखा जाएगा। ऐसा करते समय हाईकोर्ट ने सर्विस कानून के एक बुनियादी नियम को नजरअंदाज कर दिया कि सीधे भर्ती हुए लोग उन अन्य नियुक्त लोगों के मुकाबले सीनियरिटी का दावा करने के हकदार हैं, जो दूसरे तरीकों से कैडर में आए हैं।"
स्पेशल और 'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त लोगों के बीच आपसी सीनियरिटी कैसे तय होगी?
स्पेशल और 'कम्पैशनेट' आधार पर नियुक्त लोगों के बीच आपसी सीनियरिटी के मामले में कोर्ट ने निर्देश दिया कि इसे उनके रेगुलर होने की तारीखों के आधार पर तय किया जाए।
कोर्ट ने कहा,
“दया के आधार पर नियुक्त लोगों और स्पेशल तौर पर नियुक्त लोगों के बीच सीनियरिटी (वरिष्ठता) का फ़ैसला उनकी रेगुलर होने की तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए। मौजूदा हालात में यही पैमाना सबसे सही है। कर्मचारियों के दो समूहों की सीनियरिटी को लेकर किसी भी विवाद की जांच आम समझ और व्यापक सिद्धांतों के आधार पर की जानी चाहिए। सीनियरिटी से जुड़े हर विवाद में कोई न कोई ऐसी बात ज़रूर होती है, जो कर्मचारियों के किसी खास समूह के पक्ष में या उनके ख़िलाफ़ जा सकती है। इसलिए कोर्ट को मामले को व्यावहारिक नज़रिए से देखना चाहिए और हर छोटी-छोटी बात की बारीकी से जांच में नहीं पड़ना चाहिए, चाहे वह बात कितनी भी मामूली क्यों न हो। कोर्ट को यह याद रखना चाहिए कि एक ही कैडर में कर्मचारियों के दो समूहों के बीच सीनियरिटी के विवाद की जांच गणितीय सटीकता के साथ करने की ज़रूरत नहीं है। संक्षेप में, जिन मामलों में भर्ती के नियम साफ़ हैं और सीनियरिटी तय करने का तरीका बताते हैं, उन्हें छोड़कर, अस्थायी, एड-हॉक या दया के आधार पर नियुक्त लोगों की सीनियरिटी तय करने के लिए उनके रेगुलर होने की तारीख से सीनियरिटी गिनने के नियम का पालन किया जाना चाहिए।”
इसके अनुसार, कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले में बदलाव करते हुए कहा कि दया के आधार पर नियुक्त प्रेम कुमार और कन्नप्पा, 1983 बैच के सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों से ऊपर नहीं हो सकते।
Case Title : H. NAGARAJAN & ORS. Vs. STATE OF T.N. & ORS. (with connected cases)