Order XIII-A CPC | सुप्रीम कोर्ट ने कॉमर्शियल मुकदमों में 'समरी जजमेंट' के लिए गाइडलाइंस तय कीं

Update: 2026-05-01 14:55 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रोसीजर कोड के ऑर्डर XIII-A के तहत कमर्शियल मुकदमों में 'समरी जजमेंट' (संक्षिप्त फैसला) देने के लिए गाइडलाइंस तय कीं।

सिविल प्रोसीजर कोड के ऑर्डर XIII-A की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'समरी जजमेंट' अहम प्रक्रियात्मक तरीका है, जिसका मकसद कमर्शियल विवादों में काम की गति बढ़ाना और गैर-ज़रूरी मुकदमों को रोकना है।

कोर्ट ने साफ किया कि 'समरी जजमेंट' तभी दिया जाना चाहिए, जब बचाव पक्ष की दलीलें सिर्फ़ अटकलों पर आधारित हों या उनके सफल होने की कोई ठोस गुंजाइश न हो, और जहां पूरे मुकदमे से कोई सार्थक मकसद पूरा न होता हो। कोर्ट ने अदालतों को आगाह किया कि वे ऐसी दलीलों के आधार पर मुकदमों को आगे न बढ़ने दें, जो सिर्फ़ भ्रम या मनगढ़ंत हों।

कोर्ट ने ये टिप्पणियां कमर्शियल मुकदमे को मंज़ूरी देते हुए कीं। कोर्ट ने कहा कि जहां बुनियादी तथ्य निर्विवाद हों और किसी मौखिक गवाही की ज़रूरत न हो, वहां अदालतों को ऐसे कमर्शियल मुकदमों का 'समरी जजमेंट' के ज़रिए जल्द निपटारा करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह टिप्पणी की,

"...जहां कोर्ट को लगता है कि कोई दावा या बचाव पक्ष की दलील इतनी कमज़ोर है कि पहली नज़र में उसके सफल होने की कोई उचित गुंजाइश नहीं दिखती, वहां पक्षकारों को पूरे मुकदमे की मुश्किलों से गुज़ारना न तो ज़रूरी है और न ही उचित। इस तरह यह प्रावधान कोर्ट को ऐसी कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही रोकने का अधिकार देता है, जिससे बेवजह के खर्च और न्यायिक समय व संसाधनों की बर्बादी को रोका जा सके।"

बेंच ने कुछ गैर-संपूर्ण गाइडलाइंस तय कीं, जिनका पालन CPC के Order XIII-A के तहत समरी जजमेंट के लिए किसी एप्लीकेशन पर विचार करते समय किया जाना चाहिए:-

"(i) कि CPC के Order XIII-A के तहत प्रक्रियात्मक आदेश का सख्ती से पालन किया जाए।

(ii) कोर्ट को इस पर विचार करना चाहिए।

(a) क्या वादी के पास दावे या मुद्दे पर सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।

(b) क्या प्रतिवादी के पास दावे या मुद्दे का सफलतापूर्वक बचाव करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।

(iii) कोर्ट को यह भी विचार करना चाहिए कि क्या कोई अन्य कारण नहीं है जिसके चलते मामले या मुद्दे (मुद्दों) को ट्रायल के लिए आगे बढ़ने दिया जाए।

(iv) उपरोक्त का पता लगाते समय कोर्ट को हर बात को उसके ऊपरी तौर पर नहीं लेना चाहिए। साथ ही उसे 'मिनी ट्रायल' (छोटा ट्रायल) भी नहीं करना चाहिए।

(v) कि कोर्ट को 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमे का आधार)/बचाव के बीच अंतर करना होगा, जो कि किसी काल्पनिक संभावना के विपरीत वास्तविक हो।

(vi) कि समरी जजमेंट की एप्लीकेशन्स से निपटते समय कानून के छोटे बिंदुओं और उनकी व्याख्याओं पर निर्णय लेने के लिए कोर्ट को निर्णायक कदम उठाना चाहिए।

(vii) कोर्ट को न केवल अपने सामने मौजूद सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए, बल्कि उन सबूतों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनकी ट्रायल के दौरान पेश किए जाने/उपलब्ध होने की उचित उम्मीद की जा सकती है।

(viii) कि CPC के Order XIII-A के तहत कोर्ट की शक्तियों का उपयोग एक असाधारण कदम है, क्योंकि यह ट्रायल की प्रक्रिया को छोटा कर देता है। इसका उपयोग केवल वहीं किया जाना चाहिए जहाँ मौखिक गवाही और पूर्ण ट्रायल की आवश्यकता न हो।

(ix) समरी जजमेंट के बजाय पूर्ण ट्रायल की आवश्यकता का पता लगाने के लिए कोर्ट को यह देखना होगा कि क्या न्याय के हित में ट्रायल करना अधिक उपयुक्त है, ताकि –

(a) सबूतों का सही मूल्यांकन किया जा सके।

(b) गवाही देने वालों की विश्वसनीयता को परखा जा सके।

(c) सबूतों से उचित निष्कर्ष निकाले जा सकें।"

मामला

यह विवाद 2007 में DDA द्वारा नई दिल्ली के जसोला में कमर्शियल प्लॉट के लिए की गई पब्लिक नीलामी से जुड़ा है। अपीलकर्ता सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाला बनकर उभरा और उसने ₹164 करोड़ से ज़्यादा का भुगतान किया, जिसके बाद 2008 में कन्वेयंस डीड (हस्तांतरण विलेख) निष्पादित की गई।

हालांकि, ज़मीन के मालिकाना हक पर तब सवाल उठ गया, जब एक पुराने मालिक ने मुकदमा दायर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यह पाया गया कि 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' की धारा 24(2) के तहत अधिग्रहण रद्द हो गया। समय दिए जाने के बावजूद, DDA ज़मीन को दोबारा हासिल करने में नाकाम रहा।

मालिकाना हक खराब हो जाने और कब्ज़ा खो देने के बाद खरीदार ने ब्याज के साथ पूरी रकम वापस करने की मांग की।

इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या इस विवाद का निपटारा CPC के आदेश XIII-A के तहत बिना किसी पूरी सुनवाई (full trial) के किया जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा CPC के आदेश XIII-A के तहत अपीलकर्ता के मुकदमे को संक्षेप में निपटाने से इनकार करने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए गया।

फैसला

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस माहेश्वरी द्वारा लिखे गए फैसले में हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया गया, जिसमें हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता-वादी के कमर्शियल मुकदमे (पैसे की वसूली के मुकदमे) को संक्षेप में निपटाने से इनकार किया था; जबकि बुनियादी तथ्य निर्विवाद थे और प्रतिवादी मुकदमे के संक्षेप में निपटारे का विरोध करने में नाकाम रहा था।

कोर्ट ने पाया कि विवादित ज़मीन के लिए अपीलकर्ता द्वारा किया गया भुगतान निर्विवाद था और DDA ने उसे वापस नहीं किया। इसके अलावा, कोर्ट ने कमर्शियल मुकदमे के संक्षेप में निपटारे के प्रति प्रतिवादी का विरोध भी यह मानते हुए खारिज किया कि ऐसे तर्क केवल मुकदमे को लंबा खींचने और पहले से सुलझे हुए मुद्दों को फिर से खोलने का एक प्रयास है।

कोर्ट ने अपीलकर्ता के इस अनुरोध को स्वीकार किया कि मुकदमे का संक्षेप में निपटारा किया जाए। कोर्ट ने पहली नज़र में यह मान लिया कि अपीलकर्ता ने अपनी सफलता की वास्तविक संभावना दिखाने का अपना दायित्व पूरा किया, जबकि प्रतिवादी-अभियुक्त इसे गलत साबित करने में नाकाम रहा; सिवाय कुछ ऐसे मामूली आधारों को उठाने के, जिनका मामले पर कोई खास असर नहीं पड़ता और जिनके लिए पूरी सुनवाई में मुद्दों के निपटारे की ज़रूरत हो।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिए मौखिक गवाही के माध्यम से तथ्यों का पता लगाने या पूरी सुनवाई की आवश्यकता हो।"

उपर्युक्त के आधार पर अपील स्वीकार की गई और प्रतिवादी को निर्देश दिया गया कि वह 12 जुलाई, 2007 से 7.5% ब्याज सहित ₹164.91 करोड़ की राशि 8 सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को वापस करे।

Cause Title: RELIANCE EMINENT TRADING AND COMMERCIAL PRIVATE LIMITED VERSUS DELHI DEVELOPMENT AUTHORITY

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