सिर्फ़ ओरिजिनल ज्यूरिस्डिक्शन वाली सिविल कोर्ट ही आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का मैंडेट बढ़ा सकती है, रेफरल कोर्ट नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी) को कहा कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 (A&C Act) की धारा 29A (4) के तहत आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का मैंडेट बढ़ाने के लिए एप्लीकेशन सिर्फ़ धारा 2(1)(e) में बताई गई 'कोर्ट' यानी ओरिजिनल ज्यूरिस्डिक्शन वाली प्रिंसिपल सिविल कोर्ट में ही फाइल की जानी चाहिए, भले ही आर्बिट्रेटर को किसी भी अथॉरिटी ने नियुक्त किया हो।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसने धारा 29A (4) के तहत समय-सीमा बढ़ाने के कमर्शियल कोर्ट के फैसले को अमान्य कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि समय-सीमा बढ़ाने के लिए एप्लीकेशन उस 'कोर्ट' में फाइल की जानी चाहिए, जिसने आर्बिट्रेटर को नियुक्त किया।
हाईकोर्ट के इस नज़रिए से असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा:
“हमारा मानना है कि यह निष्कर्ष कि अगर हाईकोर्ट ने एक्ट की धारा 11(6) के तहत आर्बिट्रेटर नियुक्त किया तो सिविल कोर्ट द्वारा धारा 29A के तहत आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का समय बढ़ाने के लिए एप्लीकेशन पर विचार करने से पदानुक्रम संबंधी दिक्कतें, शक्ति का टकराव या क्षेत्राधिकार संबंधी विसंगति होगी, यह तर्कहीन है। इस नज़रिए को खारिज किया जाता है।”
कोर्ट ने कहा कि धारा 29A में इस्तेमाल किए गए 'कोर्ट' शब्द का सही मतलब ओरिजिनल ज्यूरिस्डिक्शन वाली सिविल कोर्ट होगा, न कि वह जिसने आर्बिट्रेटर को नियुक्त किया।
कोर्ट ने कहा,
“धारा 29A के तहत 'कोर्ट' किसी जिले में सामान्य ओरिजिनल ज्यूरिस्डिक्शन वाली सिविल कोर्ट होगी और इसमें धारा 2(1)(e) के तहत अपने ओरिजिनल सिविल ज्यूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल करने वाला हाई कोर्ट शामिल है। यह एक्ट की धारा 11(6) के तहत हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट नहीं होगी।”
कोर्ट ने बताया कि रेफरल कोर्ट के पास आर्बिट्रेशन की निगरानी करने या अवार्ड पारित करने के लिए समय बढ़ाने की एप्लीकेशन पर फैसला करने का ज्यूरिस्डिक्शन क्यों नहीं है।
इसने कहा,
“धारा 11 के तहत ज्यूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के गठन के साथ ही खत्म हो जाता है। नियुक्ति के बाद आर्बिट्रेशन की कार्यवाही पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पास कोई अवशिष्ट पर्यवेक्षी या नियंत्रण शक्ति नहीं बचती है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
"यह एक गलतफ़हमी है कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट आर्बिट्रल प्रोसीडिंग्स के कंडक्ट या आर्बिट्रल अवॉर्ड बनाने पर ऑर्वेल के 'बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू' की तरह नज़र रखते हैं। इसके अलावा, एक बार अपॉइंटमेंट हो जाने के बाद रेफरल कोर्ट का काम खत्म हो जाता है, उसका सबज्यूडिस सेंटिनल के तौर पर कोई रोल या फंक्शन नहीं होता।"
कोर्ट ने एक्ट की धारा 42 पर आधारित एक संभावित तर्क पर भी बात की और उसे खारिज कर दिया। जबकि धारा 42 उस कोर्ट को एक्सक्लूसिव ज्यूरिस्डिक्शन देता है, जिसके सामने आर्बिट्रेशन में पहला एप्लीकेशन फाइल किया जाता है। कोर्ट ने साफ किया कि यह प्रोविजन आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के लिए धारा 11 के तहत किए गए एप्लीकेशन पर लागू नहीं होता है।
स्टेट ऑफ़ झारखंड बनाम हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी, (2018) 2 SCC 602 में कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के फैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 11 के तहत काम करने वाला हाईकोर्ट धारा 42 के मकसद के लिए एक्ट के तहत परिभाषित 'कोर्ट' नहीं है। इसलिए उसकी पिछली भागीदारी बाद के प्रोसीजरल एप्लीकेशन, जैसे कि धारा 29A के तहत पर एक्सक्लूसिव ज्यूरिस्डिक्शन नहीं देती है।
Cause Title: JAGDEEP CHOWGULE VERSUS SHEELA CHOWGULE & ORS.