NGT बिल्डिंग प्लान के उल्लंघन से जुड़े विवादों पर फैसला नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी) को कहा कि NGT ऐसे विवादों पर फैसला नहीं कर सकता, जो असल में ज़मीन के इस्तेमाल, ज़ोनिंग नियमों और टाउन-प्लानिंग के पालन से जुड़े हैं, भले ही ऐसे विवादों को पर्यावरण संबंधी चिंताओं के तौर पर पेश किया जाए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,
"खुली और हरी जगहों के संबंध में बिल्डिंग प्लान का पालन न करने से जुड़ा विवाद... पर्यावरण का मुद्दा NGT के सामने कोई बड़ा सवाल नहीं था, जिससे इस मामले में NGT के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल सही ठहराया जा सके। बल्कि, यह मामला अपीलकर्ता-एम्बिएंस डेवलपर्स की ज़मीन के इस्तेमाल में अनियमितताओं से संबंधित पार्टियों के विवादित दावों से जुड़ा था, जिसका इस्तेमाल आवासीय कॉलोनी बनाने में किया गया।"
बेंच ने इस बात की पुष्टि की कि जहां विवाद मुख्य रूप से ज़मीन के इस्तेमाल, ज़ोनिंग, बिल्डिंग प्लान की मंज़ूरी और टाउन-प्लानिंग के पालन से संबंधित है, वहां यह NGT एक्ट, 2010 की धारा 14 के तहत NGT के अधिकार क्षेत्र से बाहर आता है।
बेंच ने SLP के उस बैच की सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया कि गुरुग्राम के एम्बिएंस लैगून आइलैंड प्रोजेक्ट में मूल रूप से आवासीय इस्तेमाल के लिए लाइसेंस वाली ज़मीन पर कमर्शियल निर्माण किया गया। इस तरह के विकास के पर्यावरणीय प्रभाव थे। इन दावों पर कार्रवाई करते हुए NGT ने अंतरिम आदेश पारित किए पर्यावरणीय मुआवज़ा लगाया और कथित उल्लंघनों का आकलन करने के लिए विशेषज्ञ समितियों का गठन किया। ऐसी ही एक समिति ने भारी जुर्माना लगाने और कुछ ढांचों को गिराने की भी सिफारिश की थी।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि मुख्य विवाद पर्यावरणीय गिरावट नहीं था, बल्कि डी-लाइसेंसिंग की वैधता और टाउन-प्लानिंग कानूनों के तहत ज़मीन के कमर्शियल इस्तेमाल की अनुमति थी। चूंकि ये मुद्दे पहले से ही पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में संबंधित मामलों में विचाराधीन थे, इसलिए NGT का हस्तक्षेप अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन था।
द ऑरोविल फाउंडेशन बनाम नवरोज़ केरस्प मोदी और अन्य, 2025 LiveLaw (SC) 312 का हवाला देते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि NGT का अधिकार क्षेत्र NGT एक्ट की अनुसूची I में निर्दिष्ट पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विशेष कानूनों से उत्पन्न होने वाले "पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों" तक सीमित है।
कोर्ट ने द ऑरोविल फाउंडेशन (उपरोक्त) मामले में यह बात कही,
"यह साफ़ है कि ट्रिब्यूनल के सामने किसी आवेदक द्वारा उठाया गया पर्यावरण से जुड़ा हर सवाल या विवाद एक बड़ा सवाल नहीं माना जा सकता। यह पर्यावरण से जुड़ा एक बड़ा सवाल होना चाहिए, जैसा कि धारा 2(1)(m) में बताया गया। ऐसा बड़ा सवाल शेड्यूल I में बताए गए किसी भी कानून के लागू होने से पैदा होना चाहिए। हालांकि ट्रिब्यूनल के सामने दायर मामलों में सबूतों का सख़्त कानून लागू नहीं हो सकता है, लेकिन आवेदक को अपने आवेदन में खास तौर पर शेड्यूल I में बताए गए किसी खास कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए बड़ा सवाल उठाना होगा।"
इसलिए कोर्ट ने NGT के सामने चल रही कार्यवाही को हाईकोर्ट में लंबित मामले के निपटारे तक रोक दिया। साथ ही NGT द्वारा जॉइंट एक्सपर्ट कमेटी बनाने का आदेश, जिसमें 138.83 करोड़ रुपये का जुर्माना, 10.33 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवज़ा, 25-50% मुनाफ़े को रोकने और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स को गिराने की संभावना की सिफारिश की गई, उस पर अभी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
Cause Title: RAJ SINGH GEHLOT & ORS. VERSUS AMITABHA SEN & ORS.