नगरपालिका प्रॉपर्टी रजिस्टर में सिर्फ़ एंट्री होना मालिकाना हक़ का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने MCD का दावा खारिज किया

Update: 2026-04-21 04:02 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी नगरपालिका अथॉरिटी द्वारा रखे गए प्रॉपर्टी रिकॉर्ड में सिर्फ़ एंट्री होना अपने आप में ज़मीन पर मालिकाना हक़ साबित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कानूनी तौर पर मान्य मालिकाना दस्तावेज़ों और न्यायिक फ़ैसलों की अहमियत को फिर से दोहराया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,

"MCD द्वारा रखी गई प्रॉपर्टी की लिस्ट में सिर्फ़ एक एंट्री होना अपने आप में विवादित ज़मीन पर मालिकाना हक़ का कोई मान्य सबूत नहीं हो सकता।"

बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फ़ैसला रद्द किया, जो दिल्ली नगर निगम के पक्ष में था।

हाईकोर्ट ने दिल्ली नगर निगम की इस दलील को मान लिया था कि प्रॉपर्टी MCD के प्रॉपर्टी रजिस्टर में उसके नाम पर दर्ज है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील करने वालों की उस अर्ज़ी को खारिज किया, जिसमें उन्होंने रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री के दस्तावेज़) के ज़रिए खरीदी गई ज़मीन को लेआउट प्लान में शामिल करने की मांग की थी।

यह विवाद नई दिल्ली के यूसुफ़ सराय जाट में 1600 वर्ग गज ज़मीन से जुड़ा था। इस ज़मीन को मूल रूप से 1958 में हाई स्कूल के लिए आरक्षित किया गया, लेकिन 1969 में जगह कम होने की वजह से इसे आरक्षण से मुक्त कर दिया गया। 1975 में इस ज़मीन को रजिस्टर्ड दस्तावेज़ों के ज़रिए निजी लोगों को बेच दिया गया।

1988 में सिविल कोर्ट ने मालिकों के कब्ज़े की सुरक्षा के लिए स्थायी रोक (Perpetual Injunction) का आदेश दिया। नगरपालिका अथॉरिटी की अपीलें 1992 में खारिज की गईं, जिससे ये फ़ैसले अंतिम हो गए।

जब बाद में ज़मीन खरीदने वालों ने ज़मीन को लेआउट प्लान में शामिल करने की मांग की तो नगरपालिका संस्था ने 2014 में इस अनुरोध को खारिज किया। उन्होंने अपने प्रॉपर्टी रजिस्टर और पुराने आरक्षण को आधार बनाया। जहां एक सिंगल जज ने मामले पर फिर से विचार करने का आदेश दिया था, वहीं एक डिवीज़न बेंच ने उस फ़ैसले को पलट दिया, जिसके बाद यह मामला अपील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अपील मंज़ूर करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि ऐसी एंट्रीज़ मालिकाना हक़ का पक्का सबूत नहीं होतीं, खासकर तब जब वे रजिस्टर्ड सेल डीड और सिविल कोर्ट के बाध्यकारी फ़ैसलों के विपरीत हों।

बेंच ने कहा कि सक्षम सिविल कोर्ट पहले ही मालिकाना हक़ के मुद्दे पर फ़ैसला दे चुका था, और वे फ़ैसले अब अंतिम हो चुके थे। ऐसे हालात में नगरपालिका अथॉरिटी अपने अंदरूनी रजिस्टर का सहारा लेकर उन फ़ैसलों को परोक्ष रूप से फिर से नहीं खोल सकती या उन्हें कमज़ोर नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा,

“इस बात में कोई विवाद नहीं है कि अपीलकर्ता और उनके पूर्वज, विवादित प्लॉटों पर हमेशा से शांतिपूर्ण कब्ज़े में रहे हैं। प्रॉपर्टी रजिस्टर में एक-आध एंट्री को छोड़कर MCD ने किसी भी फोरम के सामने विवादित प्लॉटों पर कभी भी अपना मालिकाना हक नहीं जताया। ऐसे हालात में डिवीज़न बेंच का यह कहना सही नहीं था कि सिविल कोर्ट का 1988 में दिया गया फ़ैसला लगभग रद्द हो जाए। इस तरह मालिकाना हक पर विवाद खड़ा हो जाए।”

इसलिए अपील मंज़ूर की गई और प्रतिवादी-कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया गया कि वह अपीलकर्ताओं के उस आवेदन पर विचार करे, जिसमें उन्होंने कॉलोनी के लेआउट प्लान में इन प्लॉटों को शामिल करने की मांग की थी। इस पर 60 दिनों के अंदर एक स्पष्ट आदेश पारित किया जाए।

Cause Title: PAWAN GARG & ORS. VERSUS SOUTH DELHI MUNICIPAL CORPORATION

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