IBC प्रक्रिया, डिक्री के निष्पादन या वसूली की कार्यवाही का विकल्प नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को फिर दोहराया कि कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) का इस्तेमाल, पैसे से जुड़ी किसी डिक्री को लागू करने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब कंपनी आर्थिक रूप से सक्षम हो और काम कर रही हो।
जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच कॉर्पोरेट देनदार द्वारा NCLAT के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देनदार के खिलाफ CIRP शुरू करने की अनुमति दी गई।
विवाद का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या कोई डिक्री-धारक लेनदार सिर्फ़ सिविल कोर्ट की डिक्री के तहत बकाया वसूलने के लिए कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू कर सकता है; खासकर तब, जब देनदार कंपनी आर्थिक रूप से मज़बूत हो और कर्ज़ की रकम को लेकर विवाद हो।
NCLAT का फैसला रद्द करते हुए कोर्ट ने NCLT का आदेश बहाल किया, जिसमें लेनदार की धारा 7 के तहत दायर अर्ज़ी खारिज की गई थी। कोर्ट ने यह माना कि सिर्फ़ पैसे से जुड़ी कोई डिक्री होने भर से किसी लेनदार को CIRP शुरू करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
साथ ही कोर्ट ने यह भी दोहराया कि IBC का इस्तेमाल, कर्ज़ वसूली के एक माध्यम के तौर पर नहीं किया जा सकता।
Cause Title: ANJANI TECHNOPLAST LTD. VERSUS SHUBH GAUTAM