घोषणात्मक डिक्री सिर्फ इसलिए रद्द नहीं की जा सकती कि वादी ने उसके निष्पादन की मांग नहीं की: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-15 10:09 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि घोषणात्मक मुकदमे में पारित डिक्री का केवल निष्पादन न होना - विशेष रूप से तब, जब वादी पहले से ही संपत्ति के कब्जे में हो - उस डिक्री को देर से चुनौती देने का कोई वैध आधार नहीं हो सकता।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें प्रतिवादी की अपील को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने के आदेश को सही ठहराया गया। यह अपील, अपीलकर्ता के पक्ष में डिक्री पारित होने के 31 साल की अत्यधिक देरी के बाद दायर की गई।

यह डिक्री 1975 में पारित हुई थी। हालांकि, अपील 2006 में दायर की गई, जिसे प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने समय-सीमा (लिमिटेशन) के आधार पर खारिज कर दिया था। हालांकि, राजस्व बोर्ड ने अपील को नई सुनवाई के लिए वापस भेज दिया, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। इसी के चलते वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में वादी की अपील का विरोध करते हुए प्रतिवादी ने डिक्री के खिलाफ अपील दायर करने में हुई देरी को सही ठहराने के लिए यह तर्क दिया कि वादी द्वारा डिक्री का निष्पादन न कराए जाने के कारण उन्हें उस डिक्री को चुनौती देने का अधिकार मिल गया था।

इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि जब अपीलकर्ता-वादी, अपने पक्ष में डिक्री पारित होने से पहले ही विवादित संपत्ति के कब्जे में था, तो उसके लिए उस डिक्री का निष्पादन कराना अनिवार्य नहीं था।

अदालत ने टिप्पणी की,

“यह मानना ​​होगा कि 16.08.1975 को पारित डिक्री को चुनौती देने में 31 साल की भारी देरी हुई। इसे 31 साल बाद, यानी 2006 में चुनौती दी गई। यह दलील कि प्रतिवादियों को बेदखल करने के लिए कोई निष्पादन याचिका दायर नहीं की गई, इसे केवल खारिज करने के लिए ही संज्ञान में लिया जा सकता है। खासकर अपीलकर्ता के इस दावे को देखते हुए कि वह अभी भी पूरी ज़मीन पर काबिज़ है। वैसे भी इस चरण पर उस डिक्री के आधार पर निष्पादन का कोई भी दावा अब समय-बाधित (Barred by Limitation) माना जाएगा। अपीलकर्ता के पक्ष में पारित घोषणात्मक डिक्री को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि अपीलकर्ता ने निष्पादन की मांग नहीं की; क्योंकि ऐसी कोई धारणा नहीं है कि डिक्री पारित होने के बाद भी कब्ज़ा प्रतिवादियों के पास ही बना रहा हो—और न ही उनके लगातार कब्ज़े की बात ही साबित हो पाई।”

परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई, जिससे अपीलकर्ता के पक्ष में 1975 में पारित डिक्री का प्रभाव बहाल हो गया।

Cause Title: Hari Ram Versus State of Rajasthan & Ors.

Tags:    

Similar News