नियमित पद के विज्ञापन के बदले संविदा पर नियुक्ति 'स्पष्ट रूप से अवैध': सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 मई) को फैसला सुनाया कि नियमित रिक्तियों के लिए जारी विज्ञापन के बदले किसी उम्मीदवार को संविदा के आधार पर नियुक्त करना "स्पष्ट रूप से अवैध और असंवैधानिक" है, खासकर तब जब इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार के लिए कोई कारण दर्ज न किया गया हो।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने असिस्टेंट प्रोफेसर द्वारा दायर अपील स्वीकार की। इस प्रोफेसर को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद में शिक्षण पदों के लिए नियमित नौकरी के विज्ञापन के बदले संविदा पर नियुक्त किया गया (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया)।
कोर्ट ने संस्थान को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियमित नियुक्ति दे, जिसमें सेवा की निरंतरता बनी रहेगी, लेकिन बीच की अवधि के लिए कोई वित्तीय लाभ नहीं दिया जाएगा।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"रिकॉर्ड में ऐसा कोई कारण सामने नहीं आया, जिसके आधार पर उस पद से वंचित किया गया हो, जिसके लिए अपीलकर्ता को शॉर्टलिस्ट किया गया और जिसका इंटरव्यू लिया गया।"
यह टिप्पणी तब की गई जब प्रतिवादी नंबर 2, यानी संस्थान, उन्हें नियमित नियुक्ति न देने के अपने फैसले को सही ठहराने में विफल रहा।
यह विवाद जनवरी 2013 में IIIT-इलाहाबाद द्वारा पे बैंड-IV और पे बैंड-III में नियमित फैकल्टी पदों के लिए जारी एक विज्ञापन से शुरू हुआ था।
अपीलकर्ता ने इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी/MSCLIS स्ट्रीम में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया। उनकी योग्यताओं में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी में Ph.D., IIIT-इलाहाबाद से साइबर लॉ और इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी में 9.02/10 CGPA के साथ प्रथम श्रेणी में M.S. और Ewing Christian College में शिक्षण का अनुभव, तथा IIIT-इलाहाबाद में गेस्ट फैकल्टी के रूप में काम करने का अनुभव शामिल था।
चयन समिति ने 18 मार्च, 2013 को उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया। जहां 13 उम्मीदवारों को नियमित नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया गया, वहीं तिवारी और एक अन्य उम्मीदवार को केवल 12 महीने की संविदा नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया गया, जिसके लिए ₹40,000 प्रति माह का निश्चित वेतन तय किया गया।
बाद में मार्च 2014 में सभी नियुक्तियां रद्द की गईं, जिसके परिणामस्वरूप इलाहाबाद हाईकोर्ट में कानूनी विवाद शुरू हो गया। हालांकि पहले दायर रिट याचिकाओं के परिणामस्वरूप नियुक्तियों पर फिर से विचार किया गया, फिर भी संस्थान ने 2017 में तिवारी को दोबारा केवल संविदात्मक नियुक्ति ही दी।
सिंगल जज और उसके बाद डिवीज़न बेंच के समक्ष उनकी चुनौती असफल रही। इसका मुख्य आधार यह था कि उन्होंने बिना किसी विरोध के संविदात्मक नियुक्ति स्वीकार की थी और उन्हीं शर्तों के तहत काम करना जारी रखा था, जिसके चलते उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में अपील करनी पड़ी।
विवादास्पद आदेश रद्द करते हुए जस्टिस भट्टी द्वारा लिखे गए निर्णय में यह टिप्पणी की गई कि यह मुद्दा किसी संविदात्मक कर्मचारी के नियमितीकरण का नहीं था, बल्कि एक ऐसी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से संविदात्मक नियुक्ति देने की वैधता का था, जो विशेष रूप से नियमित रिक्तियों के लिए ही निर्धारित थी।
न्यायालय ने यह माना कि यद्यपि अपीलकर्ता के पास नियमित पद के लिए विज्ञापन में निर्धारित आवश्यक योग्यताएँ मौजूद थीं। फिर भी नियमित रिक्तियों के लिए भर्ती प्रक्रिया आयोजित होने के बावजूद उन्हें नियमित नियुक्ति से वंचित रखा गया। न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन माना, क्योंकि समान स्थिति वाले अन्य उम्मीदवारों को नियमित पद प्रदान किए गए।
न्यायालय ने टिप्पणी की,
"हम यह पाते हैं कि शुरू की गई प्रक्रिया नियमित नियुक्ति के लिए थी। चयन समिति ने उम्मीदवारों के आवेदनों तथा उनकी योग्यताओं की जांच-परख करने के बाद भी इंटरव्यू के लिए आमंत्रित सभी उम्मीदवारों के साथ समान या एक जैसा व्यवहार नहीं किया।"
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: LOKENDRA KUMAR TIWARI VERSUS UNION OF INDIA AND OTHERS