उपभोक्ता संरक्षण कानून से संबंधित महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (10 मई) को वह तरीका तय किया, जिसमें उपभोक्ता मंचों को उपभोक्ता शिकायतों की स्थिरता के खिलाफ सेवा प्रदाताओं द्वारा उठाई गई तकनीकी दलीलों पर इस आधार पर निर्णय लेना चाहिए कि सामान/सेवाएं उपभोक्ता द्वारा वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए उपयोग किया गया।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के फैसले की पुष्टि करते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ ने कहा कि जब तक सेवा प्रदाता द्वारा यह साबित नहीं किया जाता है कि उपभोक्ता द्वारा वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए वस्तुओं/सेवाओं का लाभ उठाया गया था, सेवा प्रदाता उपभोक्ता की शिकायत की रखरखाव के बारे में विवाद नहीं कर सकता है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 यदि उपभोक्ता द्वारा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए सेवाओं का लाभ उठाया जाता है तो सेवा प्रदाताओं के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत की स्थिरता पर रोक लगाता है; हालांकि, कानून एक अपवाद बनाता है कि शिकायत उपभोक्ता द्वारा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए प्राप्त की गई सेवाओं के खिलाफ सुनवाई योग्य होगी यदि उपभोक्ता द्वारा वस्तुओं/सेवाओं का लाभ 'विशेष रूप से अपनी आजीविका कमाने के उद्देश्य से, स्वयं के रोजगार के माध्यम से' लिया जाता है।

वर्तमान मामले में प्रतिवादी/उपभोक्ता द्वारा उपभोक्ता शिकायत दायर की गई, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा व्यवसाय बंद करने पर चिट फंड कंपनी/अपीलकर्ता से सदस्यता राशि वापस करने की मांग की गई। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उपभोक्ता की शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी/उपभोक्ता ने वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए अपीलकर्ता से सामान/सेवाएं प्राप्त की थीं।

अपीलकर्ता का तर्क खारिज करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार द्वारा लिखे गए फैसले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 2(7) के तहत उपभोग की परिभाषा की जांच की गई। यह नोट किया गया कि परिभाषा के तीन भाग हैं।

परिभाषा का पहला भाग, यह साबित करने का दायित्व स्वयं शिकायतकर्ता/उपभोक्ता पर डालता है कि व्यक्ति ने प्रतिफल के लिए सामान खरीदा था/सेवाएं प्राप्त की थीं।

दूसरे भाग में यह अपवाद दिया गया कि वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए खरीदी गई वस्तुएं या ली गई सेवाएं अधिनियम के अंतर्गत शामिल नहीं हैं। इस तथ्य को साबित करने का दायित्व सेवा प्रदाता पर है न कि शिकायतकर्ता पर।

खंडपीठ ने कहा,

"दूसरे भाग में कार्व आउट क्लॉज, शिकायतकर्ताओं को अधिनियम के तहत लाभ प्राप्त करने से बाहर करने के लिए सेवा प्रदाताओं द्वारा लागू किया जाता है। यह साबित करने की जिम्मेदारी आवश्यक रूप से सेवा प्रदाता पर होनी चाहिए, न कि शिकायतकर्ता पर। यह साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 और 102 में सन्निहित सामान्य सिद्धांत के अनुरूप है कि 'जो दलील देता है, उसे साबित करना होगा', क्योंकि यह हमेशा सेवा प्रदाता की जिम्मेदारी होती है, जो दावा करता है कि सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए प्राप्त की गई। इसके अलावा, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ता-अनुकूल और लाभकारी कानून है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों का समाधान करना है। इसके अलावा, शिकायतकर्ता पर कोई नकारात्मक बोझ नहीं डाला जा सकता है, दिखाएं कि उपलब्ध सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए नहीं थी।"

एक बार, सेवा प्रदाता दूसरे भाग को संतुष्ट कर देता है तो परिभाषा का तीसरा भाग शिकायतकर्ता पर यह साबित करने का दायित्व डालता है कि उसके द्वारा प्राप्त की गई सेवाएं व्यावसायिक उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि विशेष रूप से अपनी आजीविका कमाने के लिए थीं।

अदालत ने आगे कहा,

"यदि और केवल यदि, सेवा प्रदाता यह दिखाने के अपने दायित्व का निर्वहन करता है कि सेवा का लाभ वास्तव में वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए लिया गया तो क्या शिकायतकर्ता पर अपना मामला तीसरे भाग, यानी स्पष्टीकरण धारा 2(7)(ए) के भीतर लाने का दायित्व वापस आ जाता है, यह दिखाने के लिए कि सेवा विशेष रूप से स्व-रोज़गार के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने के उद्देश्य से प्राप्त की गई थी।"

वर्तमान मामले में मापदंडों का परीक्षण करते हुए अदालत ने पाया कि सेवा प्रदाता/अपीलकर्ता यह साबित करने के लिए परिभाषा के दूसरे भाग को संतुष्ट नहीं करता है कि उपभोक्ता/प्रतिवादी ने वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए सेवाओं का लाभ उठाया था।

अदालत ने कहा,

“तीसरे भाग में पूछताछ का सवाल तभी उठेगा, जब सेवा प्रदाता अपने दायित्व का निर्वहन करके दूसरे भाग को पार करने में सफल हो जाएगा। यह साबित कर देगा कि प्राप्त सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए थी। जब तक सेवा प्रदाता अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं करता, तब तक शिकायतकर्ता पर यह दिखाने का उत्तरदायित्व नहीं जाता कि प्राप्त सेवा विशेष रूप से स्व-रोज़गार के माध्यम से उसकी आजीविका कमाने के लिए थी। इस मामले के तथ्यों में ओपी (सेवा प्रदाता) ने अपने संस्करण में केवल यह दलील दी है कि सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए प्राप्त की गई। केवल हलफनामे पर अपना दावा दोहराने के अलावा इसके मामले को संभावित बनाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया। अब यह अच्छी तरह से तय हो गया है कि बिना सबूत की याचिका और बिना दलील के सबूत कानून की नजर में कोई सबूत नहीं है।''

उपरोक्त आधार के आधार पर अदालत ने अपील खारिज कर दी और उस आदेश बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि अपीलकर्ता/सेवा प्रदाता की ओर से सेवा में कमी थी।

केस टाइटल: श्रीराम चिट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, जिसे पहले श्रीराम चिट्स (के) प्राइवेट लिमिटेड के नाम से जाना जाता था बनाम राघचंद एसोसिएट्स

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