सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जुलाई) को कहा कि सबूतों का केवल 'बड़ी मात्रा में होना' कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के तहत उन्हें देर से पेश करने के लिए "उचित कारण" नहीं माना जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,

"...यह अच्छी तरह से स्थापित है कि जब वादी सबूत पेश करता है तो उससे न केवल सभी दस्तावेज़ पेश करने की उम्मीद की जाती है, बल्कि दूसरी तरफ से उसके गवाहों से पूछे जा सकने वाले सवालों का सही अंदाज़ा लगाने की भी उम्मीद की जाती है। रुक-रुक कर या टुकड़ों में काम करने के तरीके को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सबूतों की बड़ी मात्रा भी कोई ठोस आधार नहीं है।"

कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज की, जिसमें मुख्य गवाह से जिरह (cross-examination) पूरी होने के बाद अतिरिक्त सबूत/दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर लाने की अपीलकर्ता की अर्जी को नामंजूर कर दिया गया।

शुरू में, हाईकोर्ट में ओरिजिनल सिविल केस दायर किया गया, जिसे एक्ट लागू होने के बाद कमर्शियल केस के तौर पर दोबारा नंबर दिया गया। अपीलकर्ता ने कुछ अतिरिक्त दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर लाने की कोशिश की और हाईकोर्ट ने 2018 में इसकी इजाज़त दी। हालांकि, मई 2023 में मुख्य गवाह से जिरह पूरी होने के बाद LMT ने और ईमेल, वेंडर एग्रीमेंट और बैकएंड सर्वर डेटा पेश करने के साथ-साथ अपने गवाह को दोबारा बुलाने की मांग करते हुए दूसरी अर्जी दायर की।

दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2025 में इस अर्जी को खारिज किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अतिरिक्त दस्तावेज़ पहले पेश नहीं किए जा सके, क्योंकि पार्टियों के बीच बहुत बड़ी संख्या में ईमेल का आदान-प्रदान हुआ था, अटैचमेंट के साथ कई ईमेल ट्रेल्स को ट्रैक करना मुश्किल था और कुछ मुद्दे केवल जिरह के दौरान ही सामने आए थे।

इन दलीलों को खारिज करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि यह स्पष्टीकरण कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट द्वारा संशोधित सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure) के ऑर्डर XI नियम 1(5) के तहत "उचित कारण" की आवश्यकता को पूरा करने में विफल रहा।

कोर्ट ने सुधीर कुमार बनाम विनय कुमार जी.बी. मामले का हवाला दिया,

“…ऑर्डर XI नियम 1(4) और (5) को मिलाकर पढ़ने पर यह साफ़ होता है कि वादी (plaintiff) को अपने पास मौजूद दस्तावेज़ों को वाद-पत्र (plaint) के साथ ही जमा करना ज़रूरी है। हालांकि, अगर वह चाहे तो वाद दायर करने के 30 दिनों के भीतर अतिरिक्त दस्तावेज़ जमा करने और उन पर भरोसा करने की अनुमति मांग सकता है, लेकिन इसके लिए उसे यह बताना होगा कि पहले उन्हें क्यों नहीं दिखाया गया था। इसके लिए कोई वाजिब कारण और बाद में उनके मिलने का सही कारण बताना ज़रूरी है।”

कोर्ट ने देखा कि जिन दस्तावेज़ों को पेश करने की मांग की गई, वे हमेशा से वादी के पास ही थे। उन्हें या तो वाद-पत्र के साथ या उस समय पेश किया जा सकता था, जब अतिरिक्त दस्तावेज़ों की अनुमति पहले ही दी जा चुकी थी।

कोर्ट ने यह बात कही,

“अतिरिक्त सबूतों का एक दौर पहले ही हो चुका था और उन्हें रिकॉर्ड पर लिया जा चुका था। इस अर्ज़ी के ज़रिए जिन दस्तावेज़ों को पेश करने की मांग की गई, वे LMT के पास वाद-पत्र दायर करने और बाद में अतिरिक्त सबूत पेश करने, दोनों ही समय मौजूद थे। अगर इस अर्ज़ी को मंज़ूरी दी जाती है, तो कोर्ट असल में कमर्शियल वाद की कार्यवाही में टुकड़ों-टुकड़ों में दस्तावेज़ पेश करने के तरीके को मंज़ूरी दे रहा होगा। कमर्शियल वाद की प्रक्रिया को खास तौर पर 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' (कारोबार में आसानी) को बढ़ावा देने और बड़े दांव वाले विवादों को तेज़ी से सुलझाने की ज़रूरत को ध्यान में रखकर बनाया गया।”

कोर्ट ने यह नोट किया,

“इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जो वाद मूल रूप से 27 मई 2015 को शुरू हुआ, उसे 30 जनवरी 2018 को CCA के तहत कमर्शियल वाद के तौर पर फिर से नंबर दिया गया और रजिस्टर किया गया। उसी दिन अपीलकर्ता की अतिरिक्त दस्तावेज़ों को रिकॉर्ड पर लाने की पहली अर्ज़ी मंज़ूर हुई। इसके 5 साल से ज़्यादा समय बाद, यानी 18 नवंबर 2023 को उसी आधार पर एक और अर्ज़ी दायर की गई। इस अर्ज़ी को 12 फरवरी 2025 को खारिज कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने पाया कि LMT ने कोई वाजिब कारण या सही स्पष्टीकरण नहीं दिया।”

ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: M/S. LEVITATE MOBILE TECHNOLOGIES PVT. LTD. VERSUS M/S. STANDARD CHARTERED BANK & ANR.

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