फैमिली कोर्ट जज हाईकोर्ट में जज बनने के लिए योग्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसले पर दोबारा विचार से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट जजों की उस याचिका पर विचार करने से इनकार किया, जिसमें उन्हें संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत हाईकोर्ट में जज नियुक्ति के लिए 'न्यायिक पद' पर कार्यरत माना जाने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही फैसला दिया जा चुका है और मौजूदा मामले में उस फैसले पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि 2011 में एस.डी. जोशी मामले में सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि अलग कैडर में नियुक्त फैमिली कोर्ट जज को संविधान के अनुच्छेद 217(2)(ए) के तहत 'न्यायिक पद' नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट आर. बसंत ने पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की। उन्होंने बताया कि सभी सात याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति फैमिली कोर्ट भर्ती नियमों के तहत हुई और उन्होंने सात साल से अधिक की सेवा पूरी की। इनमें से चार जजों की फैमिली कोर्ट में सेवा दस साल या उससे अधिक है, जबकि कुछ का कुल न्यायिक अनुभव 26 साल तक है।
बसंत ने दलील दी कि महाराष्ट्र में पिछले 36 वर्षों से फैमिली कोर्ट जज के पद पर न्यायिक सेवा से बाहर के किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हुई है। उनके मुताबिक, सभी नियुक्त जजों ने परीक्षा पास की और न्यायिक अधिकारी के तौर पर नियुक्त हुए हैं। इसलिए उन्हें अनुच्छेद 217 के सीमित उद्देश्य के लिए 'न्यायिक पद' पर कार्यरत माना जाना चाहिए।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रेजनिश बनाम दीपा फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि उस फैसले के बाद फैमिली कोर्ट जजों के लिए जिला जज के चयन में शामिल होने से जुड़ी कोई अयोग्यता नहीं रह गई है।
हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि रेजनिश फैसला अनुच्छेद 217 की व्याख्या से जुड़े मौजूदा सवाल पर फैसला नहीं करता।
पीठ ने सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र में फैमिली कोर्ट के लिए अलग कैडर बनाए जाने पर भी सवाल उठाया। चीफ जस्टिस ने कहा कि ज्यादातर राज्यों में फैमिली कोर्ट में जज नियमित न्यायिक सेवा से लिए जाते हैं और उन्हें प्रतिनियुक्ति पर वहां भेजा जाता है। ऐसे जज अपना न्यायिक अधिकारी का दर्जा बनाए रखते हैं और बाद में मुख्य न्यायिक कैडर में वापस जा सकते हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा,
"समस्या कहीं और है। समस्या फैमिली कोर्ट के लिए अलग कैडर बनाए जाने में है।"
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलील का वास्तविक असर अलग फैमिली कोर्ट कैडर को नियमित न्यायिक कैडर में मिलाने की दिशा में जा सकता है। बसंत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा याचिका में कैडर के विलय की मांग नहीं की गई है, बल्कि केवल अनुच्छेद 217 के उद्देश्य से फैमिली कोर्ट जज को न्यायिक पद पर कार्यरत माना जाने की मांग है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब पुराने फैसले के बाद कानून या परिस्थितियों में ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है तो उस फैसले पर दोबारा विचार क्यों किया जाए। चीफ जस्टिस ने कहा कि रेजनिश फैसला इस मुद्दे को सीधे तौर पर नहीं छूता।
जस्टिस बागची ने भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता एस.डी. जोशी फैसले के अनुपात को चुनौती देकर उसे पलटवाना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा कोई विपरीत फैसला या संविधान के अनुच्छेद 217 की ऐसी वैकल्पिक व्याख्या दिखानी होगी, जिस पर पहले विचार नहीं किया गया था।
पीठ ने यह भी कहा कि अगर अलग फैमिली कोर्ट कैडर से कोई संरचनात्मक समस्या पैदा हो रही है तो इसका समाधान नीतिगत स्तर पर किया जा सकता है। संबंधित राज्य सरकार और हाईकोर्ट आपसी विचार-विमर्श से अलग कैडर खत्म करने और फैमिली कोर्ट में नियमित उच्च न्यायिक सेवा के जजों की नियुक्ति की व्यवस्था पर विचार कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 217(2)(ए) में जिला जज के तौर पर काम करने या जिला जज नियुक्त होने की योग्यता का प्रावधान है और इसमें जिला जज के पद के बराबर पद पर होना स्पष्ट रूप से जरूरी नहीं बताया गया है। हालांकि, पीठ ने इन दलीलों के आधार पर पुराने फैसले को दोबारा खोलने से इनकार कर दिया।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अपने आदेश में पीठ ने कहा कि याचिका का मूल उद्देश्य एस.डी. जोशी फैसले की समीक्षा या उसे वापस लेने की मांग करना है, जबकि अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका इसके लिए उचित माध्यम नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इस मुद्दे को संबंधित हाईकोर्ट और राज्य सरकार के सामने उठा सकते हैं, ताकि फैमिली कोर्ट में नियुक्तियों से जुड़े नियमों में जरूरी बदलाव पर विचार किया जा सके। पीठ ने इसे नीतिगत मामला बताया और कहा कि हाईकोर्ट तथा राज्य सरकार आपसी परामर्श से उचित निर्णय ले सकते हैं।