सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में रेत खनन से जुड़ी दो नीलामियों को रद्द किए जाने के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा है कि सरकार केवल इस आधार पर सबसे ऊंची बोलियों को खारिज नहीं कर सकती कि वे पिछली नीलामी में लगाई गई बोलियों की रकम से कम हैं।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने फैसला सुनाया कि भले ही सरकार के पास बोलियों को खारिज करने का अधिकार है, लेकिन उसे इस अधिकार का इस्तेमाल निष्पक्ष तरीके से और ठोस आधारों पर करना चाहिए।

यह मामला शहदोल और कटनी जिलों में रेत खनन क्षेत्रों की नीलामी से जुड़ा है। अक्टूबर 2025 में हुई नीलामी में 'सहकार ग्लोबल लिमिटेड' और 'धनलक्ष्मी मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड' नाम की दो कंपनियां सबसे ऊंची बोली लगाने वाली (हाईएस्ट बिडर) बनकर उभरीं। दोनों कंपनियों ने सरकार द्वारा तय की गई 'रिजर्व प्राइस' (न्यूनतम कीमत) से अधिक की बोली लगाई।

हालांकि, मध्य प्रदेश राज्य खनन निगम (MP State Mining Corporation) ने इन नीलामियों को रद्द कर दिया, क्योंकि कंपनियों की नई बोलियां उनकी पिछली बोलियों की तुलना में कम थीं। निगम का तर्क था कि कम बोलियों को स्वीकार करने से सरकारी राजस्व में कमी आएगी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस रद्दीकरण को सही ठहराया, जिसके बाद कंपनियां सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं।

इस आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार ने अपने फैसले में कहा कि पिछली नीलामी में लगाई गई ऊंची बोली को बाद की नीलामी में संपत्ति का 'सही मूल्य' नहीं माना जा सकता। अगर सरकार को लगता है कि नई बोलियां अपर्याप्त हैं, तो इसके पीछे कोई ठोस और उचित आधार होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"कानून के अनुसार की गई नीलामी की अपनी एक अहमियत होती है। इसे केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि बाद में संबंधित अथॉरिटी को लगे कि शायद और ऊंची बोली मिल सकती थी।"

कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस नजरिए पर सवाल उठाया, जिसमें पिछली और नई बोलियों के बीच के अंतर को सरकारी खजाने के नुकसान के रूप में देखा गया था। कोर्ट के अनुसार, पिछली बोलियां निगम के फैसले के लिए प्रासंगिक तो हो सकती हैं, लेकिन उन्हें नई नीलामी में खनन क्षेत्रों के मूल्य का 'सही पैमाना' नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ इसलिए कि दो आंकड़ों की तुलना की जा सकती है, वह तुलना पर्याप्त नहीं हो जाती। जिस नीलामी के नतीजों को खारिज किया जा रहा है, उस नीलामी के विषय और परिस्थितियों के साथ इस तुलना का एक तार्किक संबंध होना चाहिए।"

इसमें आगे कहा गया कि पिछली बोलियां काफी अधिक हैं, लेकिन हाईकोर्ट और कॉरपोरेशन ने इस अंतर को ही निर्णायक मान लिया, जबकि उन्होंने इस बात का ठीक से आकलन नहीं किया कि नई प्रतिस्पर्धी नीलामी के नतीजे अस्वीकार्य क्यों हैं।

कोर्ट ने कहा,

"पिछली और बाद की बोलियों के बीच के अंतर को सरकारी खजाने का नुकसान मानकर हाईकोर्ट ने भी बोर्ड की तरह ही यह धारणा बना ली कि पिछली वार्षिक बोलियां ही वह सही पैमाना हैं, जिसके आधार पर सितंबर 2025 की प्रक्रिया से राजस्व मिलना चाहिए। कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों से यह बात साबित नहीं होती।"

परिणामस्वरूप, कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया और शहडोल तथा कटनी की नीलामियों को रद्द करने के कॉरपोरेशन का फैसला खारिज किया।

कोर्ट ने आदेश दिया,

"शहदोल और कटनी के लिए 18.09.2025 की टेंडर प्रक्रिया को बहाल किया जाता है। आज से दो सप्ताह के भीतर सहकार ग्लोबल लिमिटेड और धनलक्ष्मी मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड को कॉरपोरेशन को यह बताना होगा कि वे 10.10.2025 की अपनी अंतिम बोलियों—शहदोल के लिए ₹48,20,40,000 और कटनी के लिए ₹54,07,41,111—पर कायम रहने और टेंडर की बाकी शर्तों को पूरा करने के लिए बिना किसी शर्त के तैयार हैं।"

Case Title : M/S DHANLAXMI MERCHANDISE PVT. LTD. VERSUS STATE OF MADHYA PRADESH & ORS. (with connected case)

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