रिवीजन कोर्ट ट्रायल कोर्ट को संज्ञान लेने का निर्देश नहीं दे सकती: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार अधिकार का प्रयोग करते हुए अदालत ट्रायल कोर्ट को किसी आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश नहीं दे सकती। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 398 केवल आगे की जांच या आगे की न्यायिक पड़ताल का आदेश देने का अधिकार देती है संज्ञान लेने का निर्देश देने का नहीं।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने एडिशनल सेशन जज का आदेश रद्द किया जिसमें ट्रायल कोर्ट को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने कहा,
"रिवीजन कोर्ट, सेशन जज या एडिशनल सेशन जज ट्रायल कोर्ट को आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश नहीं दे सकते। यदि रिवीजन कोर्ट को लगता है कि ट्रायल कोर्ट का आदेश त्रुटिपूर्ण है तो वह उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नए सिरे से आदेश पारित करने के लिए मामला वापस भेज सकती है।"
मामले में याचिकाकर्ताओं ने रिवीजन कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें शिकायतकर्ता की पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ क्रूरता के आरोप में संज्ञान लेने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि शिकायतकर्ता ने पहले संबंधित अदालत में परिवाद दायर किया, जिसे CrPC की धारा 156 के तहत जांच के लिए पुलिस को भेजा गया। पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच की, लेकिन बाद में फाइनल रिपोर्ट लगाते हुए मामला बंद करने की अनुशंसा की। शिकायतकर्ता की विरोध याचिका भी सक्षम अदालत ने खारिज की।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने एडिशनल सेशन जज के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर की जिसे स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर आरोपियों के खिलाफ धारा 498ए के तहत संज्ञान लेने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिवीजन कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसा आदेश पारित किया जो कानून के अनुरूप नहीं है। इसलिए यह आदेश टिक नहीं सकता।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने रिवीजन कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानून के अनुसार आगे की न्यायिक पड़ताल करने का निर्देश दिया।