ई-मित्र की कथित गलती से अभ्यर्थी को राहत नहीं, सुधार की तय अवधि में श्रेणी नहीं बदली: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी शिक्षक भर्ती में OBC श्रेणी से सामान्य श्रेणी में बदलाव की मांग करने वाली अभ्यर्थी की याचिका खारिज की। अभ्यर्थी का कहना था कि आवेदन फॉर्म भरते समय ई-मित्र संचालक ने गलती से उसकी श्रेणी सामान्य के बजाय ओबीसी दर्ज की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि अभ्यर्थी को श्रेणी में सुधार के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए लेकिन उसने निर्धारित अवधि के भीतर इसका लाभ नहीं उठाया।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने कहा कि प्रतियोगी चयन प्रक्रिया में अभ्यर्थी की श्रेणी पूरे चयन के दौरान एक समान रहनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुधार का अनुरोध परिणाम घोषित होने के बाद किया गया, जबकि इससे पहले अभ्यर्थी के पास गलती सुधारने के पर्याप्त अवसर थे।
कोर्ट ने कहा कि परिणाम घोषित होने तक इंतजार करना इस बात की ओर संकेत करता है कि अभ्यर्थी ने आवेदन में दर्ज श्रेणी बदलने का विकल्प जानबूझकर नहीं चुना।
मामला चतुर्थ श्रेणी शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह सामान्य श्रेणी से संबंधित है, लेकिन आवेदन फॉर्म भरते समय ई-मित्र संचालक ने गलती से उसकी कैटेगरी ओबीसी दर्ज की।
अभ्यर्थी के अनुसार, प्रवेश पत्र जारी होने के बाद जब उसे इस गलती का पता चला तो उसने तुरंत संबंधित बोर्ड से श्रेणी में सुधार का अनुरोध किया, लेकिन इसे ठीक नहीं किया गया। इसके बाद लिखित परीक्षा आयोजित हुई, जिसमें उसे 72.95 अंक मिले, जबकि सामान्य श्रेणी की कटऑफ 32 अंक थी।
परिणाम घोषित होने के बाद उसका नाम ओबीसी कैटेगरी में दर्ज किया गया। इसके बाद उसने एक बार फिर बोर्ड के समक्ष श्रेणी में सुधार के लिए अभ्यावेदन दिया, लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच का रुख किया, जहां उसकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उसने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
अभ्यर्थी की ओर से दलील दी गई कि आवेदन में हुई गलती ई-मित्र संचालक की थी और प्रवेश पत्र में इसे देखने के तुरंत बाद उसने सुधार का अनुरोध किया था। यह भी कहा गया कि उसने जनरल कैटेगरी की कटऑफ से काफी अधिक अंक हासिल किए हैं और केवल इस तकनीकी आधार पर उसे नियुक्ति के लिए विचार से बाहर करना उसके साथ गंभीर अन्याय होगा।
इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अभ्यर्थी को कैटेगरी में सुधार के लिए कई अवसर मिले थे, लेकिन उसने निर्धारित अवधि के भीतर उनका इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए सुधार की समय-सीमा समाप्त होने के बाद उसे बाद के चरण में श्रेणी बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने भर्ती विज्ञापन में निर्धारित सुधार की अवधि का अवलोकन किया। इसके बाद कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग बनाम इसरार अहमद मामले में दिए फैसले का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चयन प्रक्रिया एक निरंतर प्रक्रिया है और प्रतियोगी चयन में अभ्यर्थी द्वारा शुरुआत में चुनी गई श्रेणी पूरे चयन के दौरान बनी रहनी चाहिए। बीच में श्रेणी बदलने की अनुमति देने से सभी अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में भी अभ्यर्थी को गलती सुधारने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए, लेकिन उसने निर्धारित अवधि के भीतर उनका लाभ नहीं उठाया। कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि श्रेणी में बदलाव का अनुरोध परिणाम घोषित होने के बाद किया गया।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अभ्यर्थी की अपील खारिज की।