विचाराधीन कैदी भी बेच सकता है अपनी संपत्ति, जेल से पावर ऑफ अटॉर्नी करना वैध: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-07-24 10:42 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी विचाराधीन कैदी को जेल में रहने मात्र से अपनी संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं छिन जाता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा व्यक्ति जेल से विधिवत पंजीकृत सामान्य या विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर सकता है और उसके अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से संपत्ति की बिक्री भी कानूनी रूप से की जा सकती है।

जस्टिस अनूप कुमार ढांढ की एकलपीठ ने कहा,

"कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि विचाराधीन कैदी अपनी संपत्ति के हस्तांतरण के अधिकार से वंचित नहीं होता। वह जेल अधीक्षक के माध्यम से जेल से सामान्य या विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर सकता है और उसका अधिकृत प्रतिनिधि कानूनी रूप से संपत्ति बेच सकता है। इसके लिए केवल यह आवश्यक है कि सत्यापन, पंजीकरण और संपत्ति पर किसी अदालत का कुर्की आदेश न होने जैसी सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।"

मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें एक विचाराधीन कैदी ने विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपने भाई दिलीप सिंह के पक्ष में सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।

उसने यह भी मांग की कि जेल परिसर में ही पावर ऑफ अटॉर्नी का सत्यापन और पंजीकरण कराया जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर विचाराधीन कैदी के रूप में केंद्रीय जेल में बंद है। उसकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और आवश्यकता के कारण उसे संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति का एक हिस्सा बेचना है। लेकिन विशेष अदालत ने यह मानते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि संभव है यह संपत्ति अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि न तो जांच एजेंसी ने आरोपपत्र में ऐसा कोई साक्ष्य पेश किया और न ही मुकदमे के दौरान ऐसा कोई प्रमाण सामने आया, जिससे यह साबित हो सके कि संपत्ति अपराध की आय से खरीदी गई।

अदालत ने कहा कि केवल अनुमान के आधार पर किसी संपत्ति को अपराध की आय से खरीदी गई नहीं माना जा सकता।

पीठ ने कहा,

"जिस व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज हुई, उसे आवश्यकता पड़ने पर अपनी संपत्ति की देखभाल करने या उसे बेचने का मौलिक अधिकार है। केवल इस कारण कि वह किसी आपराधिक मामले में आरोपी है और जेल में बंद है, उसे इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि उसे सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित करने की अनुमति नहीं दी जाती है तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।"

अदालत ने यह भी दोहराया कि जेल में बंद होने का अर्थ किसी व्यक्ति की नागरिक मृत्यु नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 300क के तहत कैदी को संपत्ति रखने, उसका स्वामित्व बनाए रखने और उसका निपटान करने का अधिकार प्राप्त है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कैदी उप-पंजीयक कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकता तो पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 38 के तहत पंजीकरण अधिकारी जेल जाकर दस्तावेज का पंजीकरण कर सकता है। वहीं राजस्थान कारागार नियम, 2022 के नियम 202 और नियम 526 में विचाराधीन तथा दोषसिद्ध कैदियों द्वारा जेल में पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित करने की प्रक्रिया का प्रावधान है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में विधिवत सत्यापित और बाद में पंजीकृत सामान्य या विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर अधिकृत प्रतिनिधि कैदी की ओर से वैध रूप से विक्रय विलेख निष्पादित कर सकता है।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश रद्द करते हुए जयपुर केंद्रीय जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा अपने भाई दिलीप सिंह के पक्ष में हस्ताक्षरित सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी का तत्काल सत्यापन कराकर बिना किसी अनावश्यक देरी के उसका पंजीकरण सुनिश्चित किया जाए।

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