भर्ती परीक्षा में डमी कैंडिडेट बैठाने का मामला: राजस्थान हाईकोर्ट ने फॉरेस्ट ऑफिसर के खिलाफ़ बरकरार रखी FIR

Update: 2026-06-08 14:33 GMT

भर्ती परीक्षा में डमी कैंडिडेट का इस्तेमाल करने की आरोपी फॉरेस्ट ऑफिसर के खिलाफ FIR रद्द करने से इनकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक परीक्षा प्रक्रिया में हेरफेर से जुड़े अपराधों को शुरुआती स्तर पर ही हल्के में नहीं लिया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कार्यरत फॉरेस्ट गार्ड पर आरोप है कि संबंधित परीक्षा में उसकी जगह एक डमी कैंडिडेट शामिल हुआ था। इसी वजह से उस पद पर उसका गैर-कानूनी चयन हुआ।

कोर्ट ने कहा,

"आरोप एक संवैधानिक भर्ती संस्था द्वारा आयोजित सार्वजनिक परीक्षा प्रक्रिया में हेरफेर से संबंधित हैं, जो सार्वजनिक रोजगार को नियंत्रित करने वाली पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत अखंडता की नींव पर ही प्रहार करते हैं। इस तरह के अपराधों को शुरुआती स्तर पर हल्के में नहीं लिया जा सकता, खासकर तब जब जांच एक विशेष एजेंसी द्वारा की जा रही हो और जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों के होने का संकेत देती हो। याचिकाकर्ता द्वारा पेश किया गया बचाव पक्ष - यानी कथित डमी कैंडिडेट का इरादा उसकी बहन के लिए परीक्षा देने का था, न कि खुद याचिकाकर्ता के लिए - तथ्यात्मक निर्णय का मामला है जिसके लिए सबूतों के मूल्यांकन की आवश्यकता है, और यह काम यह कोर्ट BNSS की धारा 528 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए उचित रूप से नहीं कर सकता। इस चरण में, इस कोर्ट को केवल यह पता लगाना है कि क्या आरोप और जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री संज्ञेय अपराधों के होने का संकेत देती है, जिसके लिए जांच जारी रखने की आवश्यकता है।"

राज्य का आरोप है कि ऑनलाइन आवेदन पत्र में याचिकाकर्ता द्वारा अपलोड की गई तस्वीरें और हस्ताक्षर एडमिट कार्ड और परीक्षा दस्तावेजों पर मौजूद तस्वीरों और हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते हैं।

इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से ही एक मामला लंबित है, जिसमें REET परीक्षा 2021 के संबंध में उस पर इसी तरह के आरोप लगाए गए। यह जानकारी याचिकाकर्ता ने मौजूदा पद हासिल करते समय संबंधित अधिकारियों को नहीं दी।

इसके विपरीत याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि फॉरेस्ट गार्ड भर्ती परीक्षा 2020 में कथित डमी कैंडिडेट का इरादा उसकी बहन की ओर से परीक्षा देने का था, न कि खुद उसके लिए। इसके अलावा, लंबित मामले को छिपाने के संबंध में यह कहा गया कि फॉर्म में केवल पिछली सजाओं के बारे में जानकारी देने की आवश्यकता थी, न कि लंबित मामलों के बारे में। दलीलों को सुनने के बाद, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप बिना किसी आधार या सामान्य दावों पर आधारित नहीं थे। बल्कि, वे जांच एजेंसी द्वारा इकट्ठा की गई सामग्री पर आधारित थे।

याचिकाकर्ता की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 528 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय वह सबूतों का मूल्यांकन नहीं कर सकता।

इस चरण में कोर्ट को केवल यह पता लगाना था कि क्या जांच के दौरान इकट्ठा किए गए आरोपों और सामग्री से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के होने का पता चलता है, जिसके लिए जांच जारी रखना ज़रूरी हो।

Title: Pramila v State of Rajasthan

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