राजस्थान हाईकोर्ट ने कॉलेज NOC को अच्छे इंस्पेक्शन के बावजूद दबाए रखने पर राज्य की आलोचना की, 'समय पर सर्विस का अधिकार' पक्का किया

Update: 2026-02-23 04:39 GMT

इंस्पेक्शन के 8 महीने बाद भी NOC जारी करने में “बहुत ज़्यादा इनएक्टिविटी” के लिए राज्य की आलोचना करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि रूटीन क्लियरेंस को प्रोसेस करने में इस तरह की चूक से पब्लिक इंटरेस्ट की अनदेखी और पब्लिक ड्यूटी निभाने में ढिलाई का पता चलता है।

इस तरह की इनएक्टिविटी पर नाराज़गी और हैरानी जताते हुए जस्टिस संजीत पुरोहित की बेंच ने कहा कि इस तरह की गलतियों की वजह से एंटिटीज़ को कोर्ट में रिट ऑफ़ मैंडेमस के लिए जाना पड़ा, जिससे लिटिगेशन का एक खतरनाक चक्र चलता रहा, जिसमें इंस्टीट्यूशन्स से कई राउंड कम्प्लायंस लिए गए जबकि एग्जीक्यूटिव ने कोई एक्शन नहीं लिया।

कोर्ट ने आगे कहा,

“इस मामले में जैसा कि अच्छे इंस्पेक्शन रिपोर्ट के बावजूद NOC एप्लीकेशन को दबाए रखने में अधिकारियों की मनमानी न केवल कानून के राज को कमज़ोर करती है, बल्कि इस कोर्ट को NOC देने की प्रक्रिया का एक ऐसा रेगुलेटर बना देती है जो तैयार नहीं है।”

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा कि यह ज़रूरी है कि एक डिटेल्ड और कॉम्प्रिहेंसिव फ्रेमवर्क तैयार किया जाए, जिसमें एप्लीकेशन प्रोसेस के हर अलग स्टेज के लिए खास टाइमलाइन बताई गई हो। राज्य को 8 हफ़्तों के अंदर राजस्थान ग्रांट ऑफ़ NOC/अप्रूवल/परमिशन (एजुकेशन) फ्रेमवर्क 2026 बनाने का निर्देश दिया गया।

बैचलर ऑफ़ नर्सिंग (B.Sc) कोर्स चलाने वाले एक इंस्टीट्यूशन ने याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया कि सभी ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद होने और जुलाई, 2025 में इंस्पेक्शन होने के बावजूद, राज्य ने न तो इंस्पेक्शन रिपोर्ट दी और न ही NOC।

तर्क सुनने के बाद और राज्य की तरफ से इतनी देरी का कोई संतोषजनक कारण न मिलने पर कोर्ट ने राज्य द्वारा 2024 में जारी 'प्राइवेट सेक्टर में नर्सिंग स्कूल/कॉलेज/यूनिवर्सिटी की स्थापना' गाइडलाइंस का रेफरेंस दिया।

यह कहा गया कि इनके अनुसार, NOC जारी करने का पूरा प्रोसेस 90 दिनों के अंदर पूरा किया जाना था और इंस्पेक्शन रिपोर्ट मिलने के 45 दिनों के अंदर एप्लीकेशन का निपटारा किया जाना था। यह कहा गया कि राज्य का कोई एक्शन न लेना उनकी अपनी गाइडलाइंस का साफ़ उल्लंघन है।

राजस्थान गारंटीड डिलीवरी ऑफ़ पब्लिक सर्विसेज़ एक्ट, 2011 का ज़िक्र किया गया और यह देखा गया कि एक्ट का मकसद पब्लिक सर्विसेज़ की समय पर और ज़िम्मेदारी के साथ डिलीवरी पक्का करना है। एक्ट की धारा 4 में तय समय सीमा के अंदर “सेवा का अधिकार” तय किया गया।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने माना कि अभी का कोई एक्शन न लेना एक्ट का पूरी तरह से उल्लंघन है, जिससे इसका मकसद ही खत्म हो रहा है। इस तरह की बिना वजह की देरी ने न सिर्फ़ नागरिकों के समय पर सेवा पाने के अधिकार का उल्लंघन किया, बल्कि ट्रांसपेरेंसी, एफिशिएंसी और पब्लिक अकाउंटेबिलिटी की बुनियाद पर भी चोट की।

आगे कहा गया,

“एक बार जब इंस्पेक्टिंग कमिटी सभी ज़रूरी कम्प्लायंस से पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है और NOC देने के लिए साफ़ सिफारिश कर देती है तो याचिकाकर्ता इंस्टीट्यूशन को फॉर्मल NOC जारी करने के लिए समय पर प्रोसेसिंग की सही उम्मीद हो जाती है। इस उम्मीद को पूरा न करने से निराशा पैदा होती है, जिससे बार-बार कोर्ट के दखल की ज़रूरत पड़ती है और एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसेस में लोगों का भरोसा कम होता है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य का एप्लीकेशन फीस जमा करने और फिर ऐसे एप्लीकेशन पर बैठने का तरीका फेयरनेस और अकाउंटेबिलिटी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इस मामले में कोर्ट ने माना कि एप्लीकेशन का जल्दी निपटारा पक्का करने के लिए सिर्फ गाइडलाइन काफी नहीं हैं। साथ ही एप्लीकेशन प्रोसेस के हर अलग स्टेज के लिए एक पूरा फ्रेमवर्क ज़रूरी है।

राज्य को सभी तरह के एजुकेशनल कोर्स/कॉलेज बनाने वगैरह के लिए ज़रूरी NOC/अप्रूवल/परमिशन देने के लिए फ्रेमवर्क बनाने और नोटिफाई करने का निर्देश दिया गया, जिसमें रियल टाइम ट्रैकिंग और सभी स्टेज के लिए सख्त टाइमलाइन वाला एक पूरी तरह से डिजिटाइज़्ड ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए।

यह कहा गया कि फ्रेमवर्क में अकाउंटेबिलिटी के लिए नोडल ऑफिसर, ज़रूरी इंस्पेक्शन, टाइम पर इंस्पेक्शन रिपोर्ट अपलोड करना, और देरी के लिए सज़ा के प्रोविज़न भी शामिल होंगे।

इस मामले के संबंध में कोर्ट ने राज्य को NOC जारी करने के लिए 15 दिन का समय दिया। साथ ही कहा कि किसी भी देरी के गंभीर नतीजे होंगे जैसे कि उचित कार्रवाई, संबंधित ऑफिसर पर पर्सनली भारी जुर्माना लगाना।

इस मामले को 9 मार्च, 2026 के लिए लिस्ट किया गया।

Title: Health and Education Care Society v The State of Rajasthan & Ors.

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