अलग रह रही विधवा जेठानी को दहेज से कोई लाभ नहीं होना था, उसके खिलाफ 498ए का मामला रद्द: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में महिला की जेठानी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। अदालत ने कहा कि विधवा और ससुराल परिवार से अलग रह रही जेठानी को कथित दहेज से कोई लाभ मिलने की संभावना नहीं थी, इसलिए उसके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया टिकाऊ नहीं हैं।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता जेठानी का उन नकदी या दहेज के सामानों से कोई लेना-देना नहीं था, जो कथित रूप से महिला के पति और सास-ससुर को दिए जाने थे।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः वैवाहिक विवादों में दहेज प्रताड़ना या उत्पीड़न के आरोप पति अथवा सास-ससुर के खिलाफ होते हैं। ऐसे मामलों में बिना ठोस आधार के दूर के रिश्तेदारों को भी आरोपी बना देना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“याचिकाकर्ता, जो शिकायतकर्ता की जेठानी है, उसका शिकायतकर्ता और उसके पति के घरेलू मामलों से कोई संबंध नहीं है। यदि पति या ससुराल पक्ष द्वारा दहेज की कोई मांग की भी गई हो तो उससे याचिकाकर्ता को कोई लाभ मिलने वाला नहीं था।”
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता के पति ने उसके खिलाफ तलाक का मामला दायर किया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पति और उसके परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया, जिसमें जेठानी को भी आरोपी बनाया गया।
पुलिस जांच के बाद आरोपपत्र केवल शिकायतकर्ता के पति के खिलाफ दाखिल किया गया। हालांकि बाद में शिकायतकर्ता के आवेदन पर निचली अदालत ने जेठानी के खिलाफ भी संज्ञान ले लिया।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह एक विधवा महिला है और अपने वैवाहिक घर में अलग रहती है। उसका शिकायतकर्ता और उसके पति के घरेलू जीवन से कोई संबंध नहीं था। उसके खिलाफ केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए, जबकि किसी विशेष घटना या भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और उसका पति दोनों सरकारी शिक्षक थे तथा विवाह के बाद अलग-अलग स्थानों पर पदस्थापित होने के कारण अलग रहते थे। वहीं, याचिकाकर्ता विधवा होने के कारण अपने अलग निवास पर रह रही थी।
अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने कहीं भी यह नहीं बताया कि जेठानी ने किस प्रकार उसके साथ कथित दुर्व्यवहार या प्रताड़ना में भाग लिया।
हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि धारा 498ए के कई मामलों में क्षणिक आवेश या अन्य कारणों से पति के लगभग सभी रिश्तेदारों को आरोपी बना दिया जाता है, यहां तक कि उन लोगों को भी जिनका विवाद से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। इसलिए उसके खिलाफ निचली अदालत द्वारा लिया गया संज्ञान रद्द करते हुए आपराधिक कार्यवाही समाप्त की गई।