पीड़ित और दोषी एक ही गांव के हों, यह अकेले पैरोल से इनकार का आधार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि दोषी और पीड़ित एक ही गांव में रहते हैं, पैरोल से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि ऐसी आशंका सिर्फ अनुमान (conjecture) पर आधारित है और इससे पैरोल के सुधारात्मक उद्देश्य पर असर पड़ता है।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को परिवार से जोड़कर उसमें आत्ममंथन और सुधार की भावना विकसित करना है।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता की पैरोल अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि वह और पीड़ित एक ही गांव में रहते हैं और पास-पास रहते हैं, जिससे पीड़ित और उसके परिवार की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि:
आपराधिक न्याय प्रणाली केवल अनुमान और आशंकाओं पर नहीं चल सकती
जब तक कोई ठोस और वास्तविक खतरे का प्रमाण न हो, पैरोल से इनकार उचित नहीं है
यदि दोषी को पैरोल के दौरान अपने घर या गांव में रहने की अनुमति नहीं दी जाए, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि वह कहां जाएगा
अदालत ने यह भी कहा कि दोषी को किसी अज्ञात स्थान पर रहने के लिए मजबूर करना अव्यावहारिक है और इससे पैरोल का उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।
संतुलन जरूरी
कोर्ट ने माना कि पीड़ित की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए कठोर शर्तें लगाकर और निगरानी रखकर दोषी के किसी भी संपर्क या डराने-धमकाने की संभावना को रोका जा सकता है।
फैसला
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए दोषी को कुछ शर्तों के साथ पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया।
इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैरोल का उद्देश्य केवल सजा में राहत देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास को बढ़ावा देना है, जिसे केवल आशंकाओं के आधार पर रोका नहीं जा सकता।