राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे दो महीने के भीतर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों (खासकर CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड) को इकट्ठा करने, जब्त करने, सुरक्षित रखने और उन्हें अदालत में साबित करने के लिए एक 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (SOP) तैयार करें और उसे लागू करें।

अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी "इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को इकट्ठा करने, जब्त करने, सुरक्षित रखने और उन्हें साबित करने की सही प्रक्रिया से अनजान हैं।"

इस पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने निर्देश दिया:

"पुलिस महानिदेशक दो महीने के भीतर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों - विशेष रूप से CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड - को इकट्ठा करने, जब्त करने, सुरक्षित रखने और साबित करने के लिए एक SOP तैयार करें और उसे जारी करें। यह SOP 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' और 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' के कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए।"

अदालत ने आगे कहा,

"आपराधिक मामलों में न्याय देना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि अदालत के सामने किस तरह के सबूत या सामग्री पेश की गई।"

ये टिप्पणियां 'ऑनर किलिंग' (सम्मान के नाम पर हत्या) के एक मामले में की गईं। इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) का सहारा लिया था, लेकिन वे इन सबूतों की एक ऐसी पूरी और अटूट कड़ी नहीं बना पाए जो केवल आरोपी के दोषी होने की ओर ही इशारा करती हो।

खंडपीठ ने गौर किया कि जांच अधिकारियों ने जांच को बहुत ही "लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से" अंजाम दिया।

2019 में हुई 'ऑनर किलिंग' के मामले में कई लोगों को दोषी ठहराए जाने और सजा सुनाए जाने के बाद यह मामला 'डेथ रेफरेंस' (मृत्युदंड की पुष्टि के लिए) के रूप में हाईकोर्ट के सामने आया था।

मामले के तथ्यों के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 23 अक्टूबर 2019 को एक रिपोर्ट दर्ज कराई। इसमें आरोप लगाया गया कि पिछली रात पांच नामजद लोगों और कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने उसके भाई को एक पेट्रोल पंप पर बुलाया था। आरोप है कि उसके भाई को बुरी तरह पीटा गया और एक गाड़ी में डालकर ले जाया गया। इसके बाद FIR दर्ज की गई, जिसके बाद मृतक और एक अन्य महिला के शव बरामद हुए। इसके बाद IPC की धारा 302 (हत्या), धारा 364 (अपहरण), धारा 201 (सबूत मिटाना) और धारा 149 (गैर-कानूनी रूप से इकट्ठा होना) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।

अपीलकर्ताओं के सीनियर वकील ने दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने यह फैसला 'केवल अटकलों और अनुमानों' के आधार पर सुनाया है, जबकि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिसे कानूनी रूप से स्वीकार किया जा सके। सीनियर वकील ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने जिस CCTV फुटेज का इस्तेमाल किया—जो एक अपीलकर्ता (मृत महिला के पिता, रामगोपाल) के घर से जब्त की गई थी—उसे घटना के साढ़े तीन महीने बाद जब्त किया गया था।

सीनियर वकील ने तर्क दिया कि घर से जब्त किए गए DVR की फुटेज को एक पेन ड्राइव में कॉपी किया गया, जिसे जब्त तो किया गया, लेकिन सील नहीं किया गया। घर से DVR को हटाकर उसका डेटा पेन ड्राइव में लेने की कोई आधिकारिक एंट्री भी दर्ज नहीं की गई।

सीनियर वकील ने संबंधित कांस्टेबल के बयान का हवाला देते हुए कहा कि पेन ड्राइव को 'आर्टिकल 1' के रूप में चिह्नित करने के बाद उसे दोबारा सील नहीं किया गया। इसी बिना सील की गई पेन ड्राइव से फुटेज का विश्लेषण किया गया, जिससे इसके सबूत के तौर पर महत्व (Probative Value) पर सवाल उठते हैं।

सीनियर वकील ने इस बात पर जोर दिया कि खराब क्लैरिटी और कम रोशनी के कारण लोगों की पहचान न हो पाने पर आपत्तियां जताई गई थीं, फिर भी ट्रायल कोर्ट ने फुटेज पर भरोसा किया। वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष 'सैंपलों की कस्टडी की अटूट चेन' (Unbroken Chain of Custody) साबित करने में विफल रहा।

इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि DVR या पेन ड्राइव में किसी तरह की छेड़छाड़ की संभावना को खारिज करने के लिए उनका FSL (फोरेंसिक साइंस लैब) परीक्षण नहीं कराया गया।

राज्य के वकील ने तर्क दिया कि पेट्रोल पंप और रामगोपाल के घर के CCTV फुटेज से अपीलकर्ताओं का अपराध पूरी तरह साबित होता है, और इन फुटेज की प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में कोई कमी रह भी गई हो, तो भी इसका फायदा अपीलकर्ताओं को नहीं मिलेगा, क्योंकि उनका अपराध हर तरह के उचित संदेह से परे साबित हो चुका है।

वकील ने आगे तर्क दिया कि अपीलकर्ता, CrPC की धारा 313 के तहत अपनी पूछताछ के दौरान उनके सामने रखी गई दोषपूर्ण परिस्थितियों को स्पष्ट करने में विफल रहे; इसलिए ट्रायल कोर्ट ने इसे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी मानकर कोई गलती नहीं की।

अदालत ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह 'ऑनर किलिंग' (सम्मान के नाम पर हत्या) का मामला था। अदालत ने पाया कि सबूतों से साबित होता है कि मृतक जोड़े की मौत स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि उन पर हुए हमले में लगी चोटों और गला घोंटे जाने के कारण दम घुटने से हुई।

पीठ ने कहा,

"चूंकि कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, इसलिए अभियोजन पक्ष का पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका है।"

सुप्रीम कोर्ट के 'टोमासो ब्रूनो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि ट्रायल कोर्ट को दोषियों को सजा सुनाने के लिए इन परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए: (क) 'लास्ट सीन थ्योरी' (आखिरी बार साथ देखे जाने का सिद्धांत) और (ख) उनके द्वारा दी गई जानकारी या अन्य तरीकों से बरामद की गई आपत्तिजनक सामग्री।

अदालत ने पाया कि न तो DVR और न ही उन पेन ड्राइव की FSL (फोरेंसिक साइंस लैब) जांच कराई गई, जिनमें फुटेज कॉपी की गई। इससे यह पुष्टि नहीं हो सकी कि डेटा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी और वह पूरी तरह सुरक्षित था। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि जिस अधिकारी ने DVR जब्त किया और फुटेज कॉपी की, वह डेटा को DVR या कंप्यूटर से पेन ड्राइव में कॉपी करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम था।

पुलिस द्वारा पेन ड्राइव और DVR के साथ की गई कार्रवाई को देखते हुए अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष CCTV फुटेज की 'चेन ऑफ कस्टडी' (साक्ष्य की सुरक्षा और निरंतरता की कड़ी) को पूरी तरह से बनाए रखने में विफल रहा। इसलिए ट्रायल कोर्ट को रामगोपाल के घर लगे कैमरों के DVR से मिली CCTV फुटेज पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।

इसके अलावा, पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह मानना ​​सही नहीं था कि CCTV फुटेज में दिखने वाली तस्वीर रामगोपाल की है। खासकर तब, जब इस आपत्ति का कोई जवाब नहीं दिया गया कि अंधेरे या खराब स्पष्टता (clarity) के कारण न तो चेहरा साफ दिख रहा था और न ही शारीरिक बनावट। इसलिए पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष रामगोपाल का अपराध साबित करने में विफल रहा।

पेट्रोल पंप से मिली CCTV फुटेज के संबंध में अदालत ने गौर किया कि प्रमाण पत्र और पत्र दोनों में यह उल्लेख था कि फुटेज को एक वीडियो CD और एक पेन ड्राइव में कॉपी किया गया था, लेकिन हैरानी की बात है कि कोई भी वीडियो CD जब्त नहीं की गई और न ही अदालत में पेश की गई। अदालत ने कहा, "यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। अभियोजन पक्ष की यह जिम्मेदारी थी कि वह परिस्थितियों की एक ऐसी पूरी और अटूट श्रृंखला साबित करे, जो केवल आरोपी के दोषी होने की ओर ही इशारा करती हो। इसके अलावा, जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं, अभियोजन पक्ष 'लास्ट सीन' (घटना से ठीक पहले देखे जाने) के साक्ष्य को भी साबित नहीं कर सका।"

पीठ ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इसे 'ऑनर किलिंग' का मामला मानकर "गंभीर भूल" की है। इसलिए 'डेथ रेफरेंस' (मृत्युदंड की पुष्टि के लिए भेजा गया मामला) खारिज कर दिया गया।

Case Title : State of Rajasthan v Ramgopal and others

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