राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि गैर-वाणिज्यिक दीवानी मुकदमों में लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा को लेकर कोई कठोर या तय फार्मूला नहीं अपनाया जा सकता। हर मामले में देरी के कारणों को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

जस्टिस सुदेश बंसल ने कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 8 नियम 1 के तहत लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा अनिवार्य नहीं, बल्कि निर्देशात्मक है। हालांकि निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति मांगने वाले पक्ष को देरी के लिए पर्याप्त कारण या उचित स्पष्टीकरण देना होगा।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें प्रतिवादी को देरी माफ करते हुए उसका लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी गई।

मामले में याचिकाकर्ता ने जून 2021 में स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। मुकदमे में 10 प्रतिवादियों को पक्षकार बनाया गया और जून 2021 में सभी को समन की तामील भी दर्ज की गई।

इनमें से एक प्रतिवादी ने अप्रैल 2026 में लिखित बयान दाखिल किया। इसके साथ उसने देरी माफ करने के लिए आवेदन भी दिया, जिसे निचली अदालत ने स्वीकार किया। इसी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि प्रतिवादी ने लिखित बयान दाखिल करने में हुई देरी के लिए पर्याप्त कारण नहीं बताया। ऐसे में आदेश 8 नियम 1 के तहत निर्धारित समय-सीमा के बाद लिखित बयान स्वीकार करने का निचली अदालत के पास कोई आधार नहीं था।

लिखित बयान की समय-सीमा का उद्देश्य मुकदमा खत्म करना है, रोकना नहीं

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कैलाश बनाम नानकू फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आदेश 8 नियम 1 में निर्धारित समय-सीमा निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं। इसका उद्देश्य मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाना है, न कि न्यायिक प्रक्रिया को ही बाधित कर देना।

कोर्ट ने एटकॉम टेक्नोलॉजीज लिमिटेड बनाम वाई.ए. चुनावाला एंड कंपनी के फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संबंधित प्रावधान प्रक्रिया संबंधी है, मूल अधिकार से जुड़ा प्रावधान नहीं। इसलिए निर्धारित अवधि बीतने के बाद भी उचित मामले में अदालत के पास लिखित बयान स्वीकार करने की शक्ति बनी रहती है।

जस्टिस सुदेश बंसल ने कहा कि गैर-वाणिज्यिक विवाद में समय-सीमा खत्म होने के बाद लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगने वाले पक्ष को देरी के लिए पर्याप्त कारण या उचित स्पष्टीकरण देना होगा। लेकिन ऐसे कारणों के लिए कोई एक तय फार्मूला नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि अलग-अलग मामलों में परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि देरी के कारणों पर फैसला मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए किया जाना चाहिए और यह अदालत की संतुष्टि पर निर्भर करेगा कि लिखित बयान रिकॉर्ड पर लिया जाए या नहीं।

हर मामले को उसकी परिस्थितियों के आधार पर देखना होगा

हाईकोर्ट ने कहा कि देरी पर विचार करते समय अदालत को उस उद्देश्य को भी ध्यान में रखना चाहिए, जिसके लिए कानून ने लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा तय की।

मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी का लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने से याचिकाकर्ता को कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ। साथ ही मुकदमे में हुई देरी के लिए प्रतिवादी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि देरी माफ करने के कारणों को कठोर और तकनीकी नजरिए से नहीं, बल्कि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लचीले तरीके से देखा जाना चाहिए।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और निचली अदालत का वह आदेश बरकरार रखा, जिसके तहत देरी से दाखिल लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी गई।

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