चुनाव लड़ने के लिए सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने वाले कर्मचारी को चुनाव हारने के बाद दोबारा सेवा में लौटने की कोशिश भारी पड़ी। राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ किया कि राजनीतिक दल के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने के बाद सरकारी कर्मचारी राजनीतिक निष्पक्षता का दावा नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह पता चलना कि इस्तीफा देने के बाद पेंशन संबंधी लाभ नहीं मिलेंगे, इस्तीफा वापस लेने के लिए बाध्यकारी कारण नहीं माना जा सकता।

जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने उत्तर पश्चिम रेलवे में वरिष्ठ लेखा परीक्षक के पद पर कार्यरत रहे कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कर्मचारी ने राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए सरकारी सेवा से इस्तीफा दिया। उसका इस्तीफा स्वीकार होने के बाद उसने एक राजनीतिक दल के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। चुनाव हारने के बाद उसने अपना इस्तीफा वापस लेने और फिर से सरकारी सेवा में बहाल किए जाने का अनुरोध किया। विभाग ने उसका अनुरोध ठुकरा दिया।

इसके बाद कर्मचारी ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। अधिकरण ने भी उसे राहत देने से इनकार किया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अधिकरण के आदेश को चुनौती दी।

कर्मचारी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि जब उसने इस्तीफा दिया था तब उसे यह जानकारी नहीं थी कि इस्तीफा स्वीकार होने के बाद उसे पेंशन संबंधी लाभ नहीं मिल पाएंगे। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद उसे इस स्थिति की जानकारी हुई। कर्मचारी का कहना था कि यह परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव है और केंद्रीय सिविल सेवा नियमों के तहत ऐसी स्थिति में इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया।

खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारी ने चुनाव लड़ने के उद्देश्य से अपनी इच्छा से इस्तीफा दिया था। इसलिए पेंशन संबंधी लाभ नहीं मिलने की जानकारी को इस्तीफा वापस लेने के लिए बाध्यकारी कारण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस्तीफा देते समय जो परिस्थितियां मौजूद थीं, उनमें बाद में ऐसा कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ, जिसके आधार पर इस्तीफा वापस लेने का अधिकार मिल सके।

केंद्रीय सिविल सेवा नियम, 1964 के नियम 26(5) के तहत इस्तीफा वापस लेने की अनुमति कुछ विशेष परिस्थितियों में ही दी जा सकती है। इसके लिए इस्तीफा किसी बाध्यकारी कारण से दिया गया हो और बाद में परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव आया हो। हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में कर्मचारी इन दोनों शर्तों को पूरा नहीं कर सका।

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू सरकारी कर्मचारियों की राजनीतिक निष्पक्षता से जुड़ा था। नियम 3(1)(vii) के अनुसार सरकारी कर्मचारी को हर समय राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है। नियम 5(1) के तहत सरकारी कर्मचारी को किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनने या राजनीति में हिस्सा लेने वाले संगठन से जुड़ने पर भी रोक है।

कर्मचारी की ओर से दलील दी गई कि उसने चुनाव सरकारी सेवा से इस्तीफा स्वीकार होने के बाद लड़ा था। इसलिए जिस समय उसने चुनाव लड़ा, उस समय वह सरकारी कर्मचारी नहीं था और राजनीतिक गतिविधियों से संबंधित आचरण नियम उस पर लागू नहीं हो सकते।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।

खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारी ने राजनीतिक दल के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा था। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि उसने राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखी। कोर्ट ने माना कि यदि इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दी जाती है और कर्मचारी की सेवा को निरंतर माना जाता है तो चुनाव लड़ने की अवधि को भी उसकी सरकारी सेवा की निरंतरता के संदर्भ में देखा जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दल के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना अपने आप में यह दिखाता है कि संबंधित व्यक्ति राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं रहा। इसलिए बाद में इस्तीफा वापस लेने की मांग करने पर वह इस गतिविधि को सरकारी सेवा से अलग रखकर लाभ नहीं ले सकता।

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी का इस्तीफा चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा से दिया गया। इसलिए चुनाव में हार जाना या बाद में पेंशन लाभ नहीं मिलने की जानकारी सामने आना इस्तीफा वापस लेने का आधार नहीं बन सकता।

हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसे बरकरार रखा और कर्मचारी की याचिका खारिज की। इस फैसले के साथ कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी सेवा छोड़कर राजनीतिक चुनाव लड़ने वाला कर्मचारी चुनाव परिणाम अपने पक्ष में नहीं आने पर केवल सेवा में वापस लौटने की इच्छा के आधार पर इस्तीफा वापस लेने का अधिकार नहीं मांग सकता।

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