राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या मात्र पुलिस निगरानी जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती।

अदालत ने उदयपुर के पुलिस अधीक्षक को एक व्यक्ति के खिलाफ खोली गई हिस्ट्रीशीट जारी रखने के फैसले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। उस व्यक्ति के खिलाफ 12 मामले दर्ज है, लेकिन उसे करीब 30 साल पहले केवल एक मामले में दोषी ठहराया गया।

जस्टिस सुनील बेनीवाल की पीठ ने निर्देश दिया कि पुलिस अधीक्षक पुनर्विचार के दौरान याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास, उसके खिलाफ दर्ज मामलों के नतीजों और मौजूदा स्थिति, रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री तथा हिस्ट्रीशीट और निगरानी प्रविष्टि जारी रखने के औचित्य की जांच करें।

इसके बाद सभी पहलुओं पर विचार करते हुए कारणों सहित आदेश पारित किया जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के तहत हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए दोषसिद्धि अनिवार्य शर्त नहीं है। हालांकि, सक्षम अधिकारी के पास यह मानने के लिए उचित आधार होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति नियमों में निर्धारित श्रेणी के अंतर्गत आता है।

पीठ ने कहा कि नियमों में निर्धारित मामलों की संख्या की सीमा को अलग से नहीं देखा जा सकता और न ही इसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुरूप विवेक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता समाप्त करने वाला माना जा सकता है। हिस्ट्रीशीट खोलने या जारी रखने का फैसला करते समय केवल मामलों की मौजूदगी ही नहीं, बल्कि उनकी संख्या, हालिया स्थिति और उनसे जुड़ी परिस्थितियों पर भी विचार करना जरूरी है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि बरी होने, समझौता हो जाने या दोषसिद्धि नहीं होने की स्थिति में हर मामले में हिस्ट्रीशीट खोलना या जारी रखना प्रतिबंधित हो जाएगा।

हाईकोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उदयपुर के पुलिस अधीक्षक के आदेश के आधार पर खोली गई हिस्ट्रीशीट रद्द करने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अधिकारियों ने उसके खिलाफ दर्ज मामलों की प्रकृति और उनमें आए नतीजों पर उचित विचार नहीं किया। केवल आपराधिक मामले दर्ज होने के आधार पर, उनके परिणाम और आरोपों की प्रकृति की जांच किए बिना हिस्ट्रीशीट खोलना उचित नहीं है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 1996 से 2025 के बीच गंभीर अपराधों से जुड़े 12 मामले दर्ज हुए। हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए दोषसिद्धि होना अनिवार्य नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने राजस्थान पुलिस नियमों के संबंधित प्रावधानों और इस विषय पर पूर्व में दिए गए फैसलों का अवलोकन किया।

पीठ ने कहा कि मामलों की संख्या को कानून के अनुरूप और कारणयुक्त विवेक के इस्तेमाल का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। सक्षम अधिकारी को मामलों की प्रकृति, उनके दर्ज होने का समय, उनमें आए नतीजे, बाद में किसी आपराधिक गतिविधि में संलिप्तता और उसके सामने रखी गई वास्तविक सामग्री का समग्र रूप से आकलन करना चाहिए।

मौजूदा मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को करीब 30 साल पहले केवल एक मामले में दोषी ठहराया गया था और उसके बाद किसी अन्य मामले में दोषसिद्धि नहीं हुई। बाकी मामलों में से चार में निगेटिव फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई, तीन में याचिकाकर्ता बरी हो चुका था, जबकि दो मामलों में सुनवाई लंबित थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने हिस्ट्रीशीट खोलने और उसे जारी रखने के फैसले पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामला उदयपुर के पुलिस अधीक्षक को वापस भेज दिया।

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