दोषसिद्धि जरूरी नहीं, आदतन अपराधी होने के उचित आधार पर खोली जा सकती है हिस्ट्रीशीट: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोलने या दोबारा सक्रिय करने के लिए पूर्व दोषसिद्धि (सजा) अनिवार्य शर्त नहीं है। यदि पुलिस के पास यह मानने के उचित आधार हैं कि कोई व्यक्ति आदतन अपराध करने का आदी है, तो उसके खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोली जा सकती है।
जस्टिस रेखा बोराणा की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस नियमों में प्रयुक्त "आदतन अपराधी" की व्याख्या राजस्थान आदतन अपराधी अधिनियम, 1953 से नहीं ली जा सकती। अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी मानने के लिए तीन दोषसिद्धियां आवश्यक हैं, जबकि पुलिस नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है।
मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है, जिसके खिलाफ वर्ष 1986 में छह आपराधिक मामलों में संलिप्तता के आधार पर हिस्ट्रीशीट खोली गई। बाद में सभी मामलों में समझौता हो गया और उसे बरी कर दिया गया, जिसके बाद हिस्ट्रीशीट को निष्क्रिय अभिलेख में रख दिया गया।
इसके बाद वर्ष 2012 में उसके खिलाफ दो नई FIR दर्ज हुईं, जिनके आधार पर पुलिस ने हिस्ट्रीशीट फिर से सक्रिय कर दी। इस कार्रवाई को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दोनों मामलों में वह बरी या मुक्त हो चुका है, इसके बावजूद पुलिस हर छह महीने में निवारक समन जारी कर रही है और उसे बंधपत्र भरना पड़ता है, जिससे मानसिक उत्पीड़न हो रहा है।
यह भी कहा गया कि वह अब सामाजिक कार्यों में सक्रिय है और सुधार के रास्ते पर चल रहा है। चूंकि उसे कभी किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया, इसलिए उसे आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता।
वहीं राज्य सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2012 में किशनगंज में हुए दंगों से जुड़े मामलों में शामिल रहा था। राज्य का कहना है कि "आदतन अपराधी" शब्द का संकीर्ण अर्थ नहीं लगाया जा सकता और इसमें ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं, जो लगातार आपराधिक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों पर नियमित निगरानी आवश्यक होती है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस नियम 4.4(3)(ख) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि ऐसे व्यक्तियों के नाम हिस्ट्रीशीट में दर्ज किए जा सकते हैं, जिनके बारे में उचित रूप से यह विश्वास किया जाता हो कि वे आदतन अपराधी हैं, चाहे उन्हें दोषी ठहराया गया हो या नहीं।
अदालत ने कहा,
"नियम 4.4(3)(ख) दोषसिद्धि को पूर्वशर्त नहीं मानता, बल्कि स्पष्ट रूप से कहता है कि दोषसिद्धि अनिवार्य नहीं है। ऐसे में 1953 के अधिनियम में दी गई आदतन अपराधी की परिभाषा, जो तीन दोषसिद्धियों पर आधारित है, इस नियम पर लागू नहीं की जा सकती।"
हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस द्वारा हिस्ट्रीशीट दोबारा खोलने की कार्रवाई को केवल इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति दोषसिद्ध नहीं हुआ है।
हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि वर्ष 2019 में याचिकाकर्ता को दोनों मामलों में राहत मिल चुकी थी और वर्ष 2012 के बाद उसके किसी नए अपराध में शामिल होने का रिकॉर्ड सामने नहीं आया।
अदालत ने राजस्थान पुलिस नियमों के नियम 4.12(1) और नियम 4.13(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यक्ति अब अपराध का आदी नहीं रह गया हो, उसकी हिस्ट्रीशीट को व्यक्तिगत अभिलेख में स्थानांतरित किया जा सकता है। वहीं लगातार सात वर्ष तक अच्छे आचरण की स्थिति में ऐसे अभिलेख नष्ट करने का भी प्रावधान है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के मामले पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही अदालत ने संबंधित पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह मामले की पुनर्समीक्षा कर हिस्ट्रीशीट को जारी रखने या बंद करने के संबंध में उचित आदेश पारित करें।