लालच के कारण हुआ साइबर ठगी का शिकार, हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता से ही वसूली के जांच खर्च का दिया निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक कथित साइबर ठगी मामले में आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि इस तरह के अधिकांश साइबर अपराध लोगों के अधिक मुनाफा कमाने के लालच के कारण सफल होते हैं।
अदालत ने मामले में जांच पर हुए खर्च की गणना कर उसे शिकायतकर्ता से वसूलने का भी निर्देश दिया।
जस्टिस रवि चिरानिया की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता के लालच के परिणामस्वरूप राज्य की पूरी जांच व्यवस्था को सक्रिय करना पड़ता है। ऐसे में पहली नजर में यदि अपराध अत्यधिक लाभ कमाने की लालसा के कारण हुआ है तो उसकी जांच पर सार्वजनिक धन खर्च नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा,
"ऐसे लालच के परिणामों की जांच करने के लिए राज्य के पास अपनी पूरी व्यवस्था को सक्रिय करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन पहली नजर में यदि अपराध ऐसे व्यक्तियों के लालच के कारण हुआ है तो उसकी जांच पर बहुमूल्य सार्वजनिक धन खर्च करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
मामला उन आरोपियों की जमानत याचिका से जुड़ा था, जिन पर एक व्यक्ति को एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस की लगभग 2.5 लाख रुपये की पॉलिसी पर अत्यधिक लाभ का लालच देकर करीब 20 लाख रुपये की ठगी करने का आरोप है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता एक सरकारी शिक्षक है और उसका मासिक वेतन 80 हजार रुपये से अधिक है।
अदालत के अनुसार, वह असामान्य रूप से अधिक लाभ पाने की लालसा में ठगों के जाल में फंस गया।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि इस मामले की जांच पर आया कुल खर्च निर्धारित किया जाए और उसकी वसूली शिकायतकर्ता से की जाए।
अदालत ने यह राशि राजस्थान के पुलिस महानिदेशक द्वारा पुलिस कर्मियों के कल्याण के लिए बनाए गए खाते में जमा कराने का निर्देश भी दिया।