जीविका का अधिकार अधिसूचित वेंडिंग जोन के बाहर सड़क किनारे कारोबार की अनुमति नहीं देता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने सड़क किनारे वाहन मरम्मत की अस्थायी दुकान चलाने वाले व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जीविका कमाने का अधिकार किसी व्यक्ति को ऐसे स्थान पर दुकान या अस्थायी ढांचा लगाने का असीमित अधिकार नहीं देता, जिसे राज्य सरकार ने वेंडिंग जोन के रूप में अधिसूचित नहीं किया।
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(छ) के तहत जीविका कमाने के अधिकार से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकता लेकिन यह अधिकार निरंकुश और असीमित भी नहीं है। जहां राज्य सरकार ने विधिवत अधिसूचना जारी कर वेंडिंग जोन निर्धारित कर दिए, वहां गैर-अधिसूचित स्थानों पर अस्थायी दुकान या किसी तरह का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले में याचिकाकर्ता वाहन मैकेनिक था और सिविल लाइंस रोड पर एक अस्थायी दुकान लगाकर काम करता था। उसने राजस्थान पथ विक्रेता आजीविका संरक्षण और पथ विक्रय विनियमन अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपना काम जारी रखने के लिए लाइसेंस देने का आवेदन किया। हालांकि उसका आवेदन लंबित था।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि अधिकारियों की ओर से उसकी दुकान हटाने की धमकी दी जा रही थी। उसका कहना था कि कानून के तहत आवश्यक नगर पथ विक्रय समिति का गठन किए बिना उसके अस्थायी प्रतिष्ठान को हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती। उसने अदालत से कानून को प्रभावी रूप से लागू करने और उसकी दुकान नहीं हटाने का निर्देश देने की मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि यही उसकी आजीविका का एकमात्र साधन है और उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हलफनामे का अदालत ने संज्ञान लिया। इसमें बताया गया कि संबंधित सड़क से सभी दुकानों और अस्थायी प्रतिष्ठानों को हटाने के संबंध में समकक्ष पीठ की ओर से पहले जारी आदेश के अनुपालन में कार्रवाई की जा रही है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस क्षेत्र को विधिवत प्रकाशित अधिसूचना के जरिये वेंडिंग जोन घोषित नहीं किया गया है, उसे आवश्यक रूप से गैर-वेंडिंग जोन माना जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जीविका का अधिकार महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है लेकिन इसके आधार पर कोई व्यक्ति अपनी पसंद के किसी भी सार्वजनिक स्थान पर दुकान लगाने का दावा नहीं कर सकता। वेंडिंग के लिए निर्धारित क्षेत्रों और नियामक व्यवस्था का पालन करना भी जरूरी है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने राज्य सरकार को नगर पथ विक्रय समिति का गठन करने का निर्देश दिया और कहा कि समिति का गठन अधिमानतः तीन महीने के भीतर किया जाए।