भरण-पोषण बकाया वसूलने की 12 महीने की समयसीमा आदेश की तारीख से शुरू होगी, पिछली अवधि से नहीं जिसके लिए राशि तय हुई: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(3) के परंतुक के तहत भरण-पोषण की बकाया राशि वसूलने के लिए निर्धारित 12 महीने की समयसीमा की गणना उस तारीख से की जाएगी, जिस दिन भरण-पोषण देने का आदेश पारित हुआ। यह समयसीमा उस पिछली तारीख से नहीं गिनी जाएगी, जिस तारीख से भरण-पोषण की राशि देने का निर्देश दिया गया।
CrPC की धारा 125(3) के परंतुक में भरण-पोषण के आदेश के तहत बकाया राशि की वसूली के लिए 12 महीने की समयसीमा निर्धारित है। यह अवधि उस तारीख से गिनी जाती है, जिस दिन संबंधित राशि देय हुई।
राशि देय होने की तारीख की व्याख्या करते हुए जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि भरण-पोषण जिस अवधि के लिए मंजूर किया गया है और न्यायिक आदेश के तहत उस राशि की वसूली का अधिकार जिस समय पैदा होता है दोनों अलग-अलग बातें हैं।
अदालत ने कहा,
“कानून में निर्धारित समयसीमा उस तारीख के आधार पर लागू होती है जिस दिन राशि देय हुई, न कि केवल उस अवधि के आधार पर जिसके लिए भरण-पोषण की गणना की गई। इस मामले में राशि देय होने के तुरंत बाद वसूली का आवेदन समयसीमा के भीतर दाखिल किया गया।”
हाईकोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत प्रतिवादी के अंतरिम भरण-पोषण की बकाया राशि वसूलने के आवेदन को मंजूर किया गया। निचली अदालत ने याचिकाकर्ता की कृषि भूमि के खिलाफ कुर्की वारंट भी जारी किया।
मामले के तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता के खिलाफ जून 2022 में अंतरिम भरण-पोषण का आदेश पारित किया गया। इस आदेश के तहत भरण-पोषण की गणना प्रतिवादी द्वारा आवेदन दाखिल करने की तारीख यानी अगस्त 2020 से की जानी थी।
इसके बाद प्रतिवादी ने जून 2022 में बकाया राशि की वसूली के लिए आवेदन दाखिल किया। निचली अदालत ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए वह आदेश पारित किया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वसूली का आवेदन CrPC की धारा 125(3) के तहत निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल किया गया, क्योंकि भरण-पोषण की राशि अगस्त 2020 से देय मानी गई। इसलिए उसके अनुसार, 12 महीने की सीमा के कारण बकाया राशि की वसूली नहीं की जा सकती थी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जून 2022 में भरण-पोषण का आदेश पारित होने से पहले संबंधित राशि वसूली योग्य रूप से देय नहीं हुई थी, क्योंकि प्रतिवादी के पास उसकी वसूली का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं था। इसलिए राशि अगस्त 2020 में नहीं बल्कि जून 2022 में देय हुई।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि 4 जून 2022 को आदेश पारित होने के बाद देय होने वाली मासिक किस्तों की स्थिति अलग होगी।
हाईकोर्ट ने कहा,
“एक बार आदेश पारित हो जाने के बाद वसूली का वैध अधिकार उत्पन्न हो जाता है। इसके बाद प्रत्येक अगले महीने के लिए देय भरण-पोषण की राशि आदेश की शर्तों के अनुसार देय हो जाती है। यदि इसके बाद बकाया राशि की वसूली के लिए कोई आवेदन दाखिल किया जाता है, तो उस पर सीआरपीसी की धारा 125(3) के तहत निर्धारित समयसीमा लागू होगी। इसकी गणना प्रत्येक संबंधित राशि के देय होने की तारीख से की जाएगी।”
इस प्रकार हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा और याचिका खारिज की।